सीजेपी छात्र आंदोलन: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, प्रदर्शनकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई पर रोक, SIT गठन के निर्देश
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नई दिल्ली: सीजेपी (कॉकरोच जनता पार्टी) छात्र आंदोलन के दौरान हुई हिंसा और पुलिस कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शनकारी छात्रों को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर और दंडात्मक कार्रवाई पर फिलहाल रोक लगा दी है।

** निष्पक्ष जांच के लिए SIT का गठन** सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार और सात राज्यों को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने हिंसा की निष्पक्ष जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) गठित करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 3 अगस्त को होगी।

सीजेआई ने पुलिस की कार्यशैली पर उठाए सवाल मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। सीजेआई ने स्पष्ट किया कि विरोध प्रदर्शन के दौरान कानून हाथ में लेने वालों पर कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों पर पुलिस की ज्यादतियां भी स्वीकार्य नहीं हैं।

सीजेआई ने टिप्पणी की कि आंदोलन की शुरुआत शांतिपूर्ण थी, लेकिन बाद में हिंसा भड़क गई। उन्होंने कहा कि इसके दो कारण हो सकते हैं—या तो पुलिस की अत्यधिक सख्ती या फिर प्रदर्शन में शामिल हुए उपद्रवी तत्व।

पैलेट गन और बिना वर्दी के पुलिसकर्मी सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कई गंभीर मुद्दों पर चिंता जताई। इसमें पैलेट गन का इस्तेमाल, इलेक्ट्रिक बैटन का प्रयोग, वकीलों और मीडिया कर्मियों पर हमले शामिल हैं। एक 19 वर्षीय युवक की आंखों की रोशनी जाने और एक युवती के आईसीयू में भर्ती होने का मामला भी संज्ञान में लिया गया।

कोर्ट ने उन आरोपों पर भी गौर किया जहां पुलिसकर्मी बिना यूनिफॉर्म के हथियार लेकर प्रदर्शन में शामिल थे और बल प्रयोग कर रहे थे।

याचिकाकर्ता की प्रमुख मांगें याचिकाकर्ता के वकील गोपाल शंकरनारायणन ने मांग की कि प्रदर्शनकारियों की डिजिटल टेक्नोलॉजी के जरिए पहचान सार्वजनिक न की जाए, क्योंकि इसमें कई नाबालिग छात्र शामिल हैं। उन्होंने पूर्व मुख्य न्यायाधीश की निगरानी में एसआईटी जांच की मांग की है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अब समय आ गया है कि प्रदर्शनों से निपटने के लिए एक समान राष्ट्रीय प्रोटोकॉल बनाया जाए, ताकि भविष्य में जवाबदेही तय करना आसान हो सके। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का अधिकार संविधान के दायरे में आता है और इसे केवल प्रदर्शन होने के आधार पर नहीं दबाया जा सकता।

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