शेयर बाजार में गिरावट आते ही सबसे पहले मिडकैप (Midcap) और स्मॉलकैप (Smallcap) शेयरों में बिकवाली शुरू हो जाती है। बाजार के जानकार अक्सर इन्हें महंगा, जोखिम भरा और कम लिक्विडिटी वाला बताकर इनसे दूरी बनाने की सलाह देते हैं। लेकिन, पिछले 20 साल का डेटा एक अलग ही कहानी बयां करता है।
इतिहास गवाह है कि जब भी भारतीय बाजार तेजी (Bullrun) की ओर बढ़ता है, तो मिडकैप और स्मॉलकैप शेयर ही सबसे ज्यादा मुनाफा कमाकर देते हैं। जहां लार्जकैप (Largecap) शेयर बुरे दौर में पोर्टफोलियो को सुरक्षा देते हैं, वहीं अच्छे मार्केट में ये मिड और स्मॉलकैप की रफ्तार का मुकाबला नहीं कर पाते।
एडलवाइस एसेट मैनेजमेंट के हालिया आंकड़ों के मुताबिक, 2009 से लेकर 2024 तक के हर बड़े बुल फेज में मिड और स्मॉलकैप ने निफ्टी 100 (लार्जकैप) को पीछे छोड़ा है।
मिड और स्मॉलकैप की तेजी के साथ जोखिम भी जुड़ा है। डेटा साफ दिखाता है कि जब बाजार में गिरावट आती है, तब सबसे ज्यादा चोट भी इन्हीं शेयरों को लगती है। 2008 के वित्तीय संकट में जहां लार्जकैप 53.1% गिरे थे, वहीं स्मॉलकैप में 68.6% की भारी गिरावट देखी गई थी।
यही कारण है कि बाजार के अस्थिर दौर में निवेशक लार्जकैप को एक सुरक्षित ढाल मानते हैं, क्योंकि इनमें गिरावट अपेक्षाकृत नियंत्रित रहती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव इस बात पर निर्भर नहीं होना चाहिए कि कौन सा शेयर बेहतर है, बल्कि इस पर होना चाहिए कि आपको भारतीय अर्थव्यवस्था पर कितना भरोसा है।
यदि आपका नजरिया लंबा है और आप भारत की विकास गाथा (Growth Story) पर दांव लगाना चाहते हैं, तो पोर्टफोलियो में मिड और स्मॉलकैप का समावेश जरूरी है। हालांकि, बाजार की अनिश्चितता से बचने के लिए लार्जकैप का संतुलन भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिमों के अधीन है। यह लेख केवल जानकारी के उद्देश्य से है। किसी भी निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार से परामर्श अवश्य लें।
Mid & smallcaps get scolded a lot.
— Niranjan Avasthi (@avasthiniranjan) July 23, 2026
They get scolded in every correction. Get questioned on their volatility, governance, liquidity, valuations, etc..
But when you look at 20 years of calendar-year returns, the scolding gets questionable.
In every strong year for Indian… pic.twitter.com/wLCVokaeI6
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