जंतर-मंतर पर सन्नाटा: 36 दिनों के आक्रोश की निशानियां मिटाई गईं, आंदोलन का अंत
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परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और नीट पेपर लीक मामले को लेकर पिछले 36 दिनों से दिल्ली का जंतर-मंतर जिस तरह से गूंज रहा था, रविवार को वहां पूरी तरह सन्नाटा पसरा रहा। शनिवार शाम आंदोलन की मांगों के पूरा होने के बाद प्रदर्शनकारियों ने जगह खाली कर दी है।

मिटाए गए विरोध के निशान रविवार को नगर निगम के कर्मचारियों ने जंतर-मंतर के आसपास की उन दीवारों पर रंग-रोगन कर दिया, जो पिछले एक महीने से छात्र आंदोलन के नारों और पोस्टरों से पटी हुई थीं। कभी विरोध का केंद्र रही ये दीवारें, जो सरकार के खिलाफ युवाओं के आक्रोश का जीवंत दस्तावेज बनी थीं, अब फिर से एक साधारण दीवार में तब्दील हो गई हैं।

आंदोलन की यादें और दीवारों की भाषा इम्पीरियल होटल की दीवार से लेकर पेड़ों के तनों तक, हर जगह छात्रों ने तीखे व्यंग्य, मीम्स और राजनीतिक संदेश लिखे थे। इसमें सरकार की विफलताओं से लेकर गोदी मीडिया जैसे तीखे प्रहार शामिल थे। इन नारों में एक पीढ़ी का वह असंतोष साफ झलक रहा था, जिसने अंततः शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक का रास्ता तय किया।

अभिजीत दीपके: जीत के बाद सुकून की नींद आंदोलन का नेतृत्व करने वाली CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके फिलहाल टाइफाइड से जूझ रहे हैं। अपने घर से जारी एक वीडियो संदेश में उन्होंने कहा, 36 दिनों की अनिश्चितता के बाद, आज मैं अपने कमरे में चैन से सो सका। अब कोई घबराहट नहीं है। उन्होंने उन सभी समर्थकों का आभार जताया, जिन्होंने संदेह के बावजूद उन पर भरोसा किया।

क्यों खत्म हुआ आंदोलन? CJP ने शनिवार को घोषणा की कि सरकार ने उनकी प्रमुख मांगें मान ली हैं। इनमें नीट पेपर लीक के कारण जान गंवाने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा देना और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकियां (FIR) वापस लेना शामिल है। सोनम वांगचुक सहित कई प्रमुख कार्यकर्ताओं और छात्र संगठनों के समर्थन के बाद यह आंदोलन एक बड़ा स्वरूप ले चुका था।

अगला पड़ाव: क्या अब निशाने पर गृह मंत्री? धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद अब राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। संसद के मानसून सत्र में अब विपक्ष का अगला रुख क्या होगा, इस पर नजरें टिकी हैं। चर्चा है कि विपक्षी दल अब गृह मंत्री अमित शाह को लेकर सरकार को घेरने की रणनीति तैयार कर रहे हैं।

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