तिरंगे के नीचे मीराबाई चानू की भावुक जीत: स्वर्ण पदक के साथ छलके गौरव के आंसू
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पोडियम पर सबसे ऊंचे पायदान पर खड़ी मीराबाई चानू के गले में जैसे ही कॉमनवेल्थ गेम्स का गोल्ड मेडल पहनाया गया, स्टेडियम में सन्नाटा पसर गया। फिर गूंजी जन गण मन की धुन, जिसने हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा कर दिया। तिरंगे को धीरे-धीरे ऊपर चढ़ते देख मीराबाई की आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली। यह आंसू सिर्फ जीत की खुशी के नहीं थे, बल्कि उस संघर्ष की दास्तान थे जो वर्षों के अथक परिश्रम और चोटों के दर्द से उपजे थे।

12 साल का लंबा सफर: ग्लासगो से ग्लासगो तक

मीराबाई के लिए यह पदक करियर की सबसे भावुक परीक्षा था। साल 2014 में इसी ग्लासगो शहर में उन्होंने पहली बार कॉमनवेल्थ गेम्स में सिल्वर मेडल जीता था। 12 साल बाद, उसी मिट्टी पर उन्होंने इतिहास रच दिया—लगातार तीसरा कॉमनवेल्थ गोल्ड मेडल। पोडियम पर खड़े होकर वे शायद उन दिनों को याद कर रही थीं, जब मणिपुर की गलियों से निकलकर उन्होंने विश्व मंच तक का कठिन सफर तय किया था। ये आंसू उन रातों का हिसाब थे, जब दर्द के कारण वे सो नहीं पाई थीं।

दबावों के बीच चट्टान सा इरादा

खेल के दौरान राह आसान नहीं थी। पहले स्नैच प्रयास में 82 किग्रा भार न उठा पाने से पूरा देश सहम गया था। लेकिन चानू का इरादा अडिग था। उन्होंने दूसरे प्रयास में शानदार वापसी की और तीसरे प्रयास में 85 किग्रा उठाकर नया कॉमनवेल्थ रिकॉर्ड कायम कर दिया। क्लीन एंड जर्क में भी शुरुआत में एक चूक हुई, लेकिन अंततः 190 किग्रा के कुल भार के साथ उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वियों को मीलों पीछे छोड़ दिया। वे किसी और से नहीं, बल्कि खुद के बनाए रिकॉर्ड्स से मुकाबला कर रही थीं।

असली चैंपियन वो है जो लड़कर वापस आए

गोल्ड मेडल समारोह के दौरान मीराबाई ने अपने हाथों से चेहरा ढक लिया, लेकिन उनकी आंखों की चमक और गालों पर ढलकते आंसू उनके गहरे जज्बात बयां कर रहे थे। उन्होंने बार-बार हाथ जोड़कर तिरंगे को नमन किया। यह दृश्य वहां मौजूद हर दर्शक की आंखों में आंसू ले आया।

टोक्यो ओलंपिक में देश का मान बढ़ाने वाली इस दिग्गज एथलीट ने एक बार फिर साबित किया कि चैंपियन वह नहीं जो सिर्फ जीतता है, बल्कि वह है जो हर असफलता से लड़कर फिर से पोडियम के शीर्ष पर पहुंचता है। 2026 के ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल मीराबाई की स्वर्णिम हैट्रिक और उन आंसुओं के लिए याद रखे जाएंगे, जिन्होंने स्वर्ण पदक से भी ज्यादा अनमोल कहानी लिख दी।

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