चाय की दुकान से गोल्ड मेडल तक: मीराबाई चानू की संघर्ष भरी गौरवगाथा
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अगर इरादों में फौलाद और सीने में आग हो, तो गरीबी की दीवारें भी छोटी पड़ जाती हैं। भारत की स्टार वेटलिफ्टर मीराबाई चानू ने इसे सच कर दिखाया है। हाल ही में ग्लास्गो कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतकर उन्होंने इतिहास रच दिया है। यह उनका लगातार तीसरा कॉमनवेल्थ गोल्ड है, जो उनकी अटूट मेहनत का प्रमाण है।

गरीबी और अभावों में बीता बचपन 1994 में मणिपुर के एक छोटे से गांव नोंगपोक काकचिंग में जन्मीं मीराबाई का सफर आसान नहीं था। छह भाई-बहनों में सबसे छोटी चानू के पिता एक मामूली निर्माण श्रमिक थे, जबकि उनकी मां चाय और समोसे की दुकान चलाती थीं। आठ लोगों के परिवार में दो वक्त की रोटी जुटाना भी एक बड़ी चुनौती थी।

पानी पीकर की ट्रेनिंग वेटलिफ्टिंग के लिए शरीर को उच्च पोषण और प्रोटीन की जरूरत होती है। लेकिन आर्थिक तंगी के कारण कई बार उन्हें सही डाइट नसीब नहीं होती थी। उन्होंने ऐसे भी दिन देखे हैं जब बिना कुछ खाए, सिर्फ पानी पीकर वे कड़ी मेहनत करने के लिए जिम पहुंच जाती थीं। उन्होंने अभावों को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी ताकत बनाया।

बांस से शुरू हुआ सफर शुरुआती दिनों में जब उनके पास वेटलिफ्टिंग की भारी किट नहीं थी, तब उन्होंने बांस के तनों को बारबेल बनाकर अपनी ट्रेनिंग शुरू की। ट्रेनिंग सेंटर तक पहुंचने के लिए उनके पास बस का किराया भी नहीं होता था। वे अक्सर रेत से भरे ट्रकों में लिफ्ट मांगकर 20-40 किलोमीटर का सफर तय करती थीं।

सफलता के बाद अपनों को नहीं भूलीं मीराबाई चानू का बड़प्पन देखिए कि जब वे ओलिंपिक पदक जीतकर स्टार बनीं, तो उन्होंने उन ट्रक ड्राइवरों को सम्मानित किया जिन्होंने कभी उन्हें ट्रेनिंग सेंटर तक लिफ्ट दी थी। आज वे पद्म श्री और मेजर ध्यानचंद खेल रत्न से सम्मानित हैं और मणिपुर पुलिस में एएसपी (स्पोर्ट्स) के पद पर तैनात होकर देश की सेवा कर रही हैं।

जेन जी के लिए प्रेरणा मीराबाई चानू की यह कहानी आज की पीढ़ी के लिए एक कड़ा संदेश है। सुविधा और संसाधनों के रोने रोने के बजाय, अगर लक्ष्य पर नजर और उसे पाने का जुनून हो, तो दुनिया की कोई भी बाधा आपको चैंपियन बनने से नहीं रोक सकती। उनका सफर हमें सिखाता है कि हार तब तक नहीं होती जब तक आप खुद हार मान लें।

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