सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुयन ने भारत में असहमति की घटती जगह और न्याय व्यवस्था में आ रही सख्ती पर गंभीर चिंता जताई है। शनिवार को भोपाल के राष्ट्रीय विधि संस्थान विश्वविद्यालय (NLIU) में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने स्पष्ट कहा कि अब विरोध के वैध तरीकों को भी अपराध की श्रेणी में डाल दिया जाता है।
विरोध करने वाले छात्र निशाने पर जस्टिस भुयन ने कहा कि हालात ऐसे हो गए हैं कि अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले छात्रों को गिरफ्तार कर लिया जाता है। उन्हें हफ्तों तक जमानत नहीं मिलती और जब मिलती भी है, तो अदालतें ऐसी शर्तें थोप देती हैं जो उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को पूरी तरह सीमित कर देती हैं। उन्होंने इसे लोकतंत्र के लिए खतरनाक बताया।
जमानत पर अजीबोगरीब शर्तें जस्टिस भुयन ने जमानत मिलने के बाद लगाई जाने वाली प्रतिबंधात्मक शर्तों पर सवाल उठाए। उन्होंने गुलफिशा फातिमा जैसे मामलों का जिक्र किया, जहां कोर्ट ने जमानत तो दी, लेकिन किसी भी प्रकार की सार्वजनिक सभा या वर्चुअल मीटिंग में शामिल होने पर रोक लगा दी। उन्होंने तंज कसते हुए पूछा, क्या अदालतें ऐसे आदेश देकर यह संदेश दे रही हैं कि लोग सार्वजनिक गतिविधियों में हिस्सा न लें?
चिकन खाने पर भी जेल? जस्टिस भुयन ने उस मामले का भी उल्लेख किया जहां गंगा में नाव पर इफ्तार पार्टी करने वाले युवाओं को गिरफ्तार किया गया। उन्होंने कहा, मैं खुद से पूछता हूं कि क्या किसी को ऐसी गतिविधि के लिए तीन महीने तक जेल में रखा जा सकता है? क्या चिकन खाना कोई अपराध है? जिस काम को कानून अपराध नहीं मानता, उसमें जमानत कैसे रोकी जा सकती है?
हाई कोर्ट के देशभक्ति वाले रुख पर असहमति जस्टिस भुयन ने बॉम्बे हाई कोर्ट की उस टिप्पणी की भी आलोचना की, जिसमें गाजा में हिंसा के खिलाफ प्रदर्शन की मांग पर कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को देशभक्त बनने की सलाह दी थी। उन्होंने कहा कि भारत ने हमेशा फिलिस्तीन को मान्यता दी है, ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर आवाज उठाने को देशभक्ति से जोड़कर देखना पूरी तरह अजीब है।
रिटायरमेंट के बाद राजनीति पर प्रहार न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर जोर देते हुए जस्टिस भुयन ने कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद जजों का राजनीति में जाना गलत है। उन्होंने तीन पैरों वाले स्टूल का उदाहरण देते हुए समझाया कि यदि न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच की दूरी खत्म हो जाएगी, तो लोकतंत्र का स्टूल गिर जाएगा। उन्होंने पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ द्वारा केशवानंद भारती मामले पर उठाए गए सवालों को भी पूरी तरह गलत करार दिया।
सोशल मीडिया पर बहस जस्टिस भुयन की यह टिप्पणी अब आम लोगों और कानूनी विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय बन गई है। जहां कुछ लोग इसे असहमति की दबी हुई आवाज मानते हैं, वहीं सोशल मीडिया पर कई उपयोगकर्ताओं ने यह सवाल भी उठाया है कि क्या जज केवल व्याख्यान में ही ऐसी बातें कहेंगे या आने वाले फैसलों में भी इसे लागू करेंगे।
*Justice Bhuyan lamented that the space for dissent in India was shrinking.#JusticeUjjalBhuyan #SupremeCourt #studentsprotest #Bail pic.twitter.com/EZ2k2LIYaF
— Aftab Alam (@aftabistan) July 25, 2026
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