राजद को बड़ा झटका: मृत्युंजय तिवारी ने थामा भाजपा का दामन, कहा- खून का हर कतरा अब राष्ट्र के लिए
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बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राष्ट्रीय जनता दल (RJD) को एक बड़ा सियासी धक्का लगा है। पार्टी के कद्दावर नेता और लंबे समय तक प्रवक्ता की भूमिका निभा चुके मृत्युंजय तिवारी ने भाजपा का दामन थाम लिया है। पटना में आयोजित एक कार्यक्रम में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने उन्हें पार्टी की औपचारिक सदस्यता दिलाई।

संगठन विस्तार में जुटी भाजपा मृत्युंजय तिवारी के साथ अरविंद कुमार अशोक, मुकेश शुक्ला, संजीव दुबे, अमन कुमार और अमित चौबे समेत कई अन्य नेताओं और कार्यकर्ताओं ने भी भाजपा की सदस्यता ली। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनाव से पहले विपक्षी खेमे में सेंधमारी करके भाजपा अपने संगठन को और अधिक आक्रामक और मजबूत बनाने की रणनीति पर काम कर रही है।

RJD को मिली सम्मान की कमी भाजपा में शामिल होने के बाद मृत्युंजय तिवारी ने अपनी पुरानी पार्टी पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि 20 वर्षों तक निष्ठा से काम करने के बावजूद उन्हें RJD में वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे। तिवारी ने साफ कहा, राजनीति में मैंने हमेशा मूल्यों को प्राथमिकता दी, लेकिन अब RJD अपनी मूल विचारधारा और दिशा से पूरी तरह भटक चुकी है।

खून का हर कतरा समर्पित भाजपा नेतृत्व का आभार जताते हुए तिवारी ने भावुक अंदाज में कहा कि अब उनके जीवन का लक्ष्य बदल गया है। उन्होंने संकल्प लिया, मेरा खून का एक-एक कतरा अब भाजपा और राष्ट्रहित के लिए समर्पित रहेगा। उन्होंने भाजपा को विकास और सुशासन की राह पर चलने वाली पार्टी बताया।

RJD के लिए संगठनात्मक संकट मृत्युंजय तिवारी लंबे समय तक टीवी डिबेट और प्रेस कॉन्फ्रेंस में RJD का सबसे मुखर और तेज-तर्रार चेहरा रहे हैं। उनका पार्टी छोड़ना सिर्फ एक नेता का जाना नहीं, बल्कि RJD की मीडिया रणनीति और जमीनी पकड़ के लिए एक बड़ा नुकसान माना जा रहा है। अब चुनौती RJD के सामने अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने और संगठन को एकजुट रखने की है।

बिहार चुनाव में बदलेगा समीकरण? बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले नेताओं का दल-बदल का सिलसिला तेज हो गया है। मृत्युंजय तिवारी जैसे अनुभवी चेहरे के भाजपा में आने से चुनावी समीकरणों में बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। अब सबकी नजर इस बात पर है कि आगामी चुनाव अभियान में भाजपा तिवारी का उपयोग किस भूमिका में करती है और इसका असर राज्य की राजनीति पर कितना गहरा होता है।

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