धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा क्यों नहीं ले रही सरकार? विरोध के बीच क्या है भाजपा की सोची-समझी रणनीति
News Image

नीट पेपर लीक मामले और अन्य शिक्षा संबंधी विवादों के बीच देश भर में धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग तेज हो गई है। सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल से लेकर संसद और पीएम आवास के बाहर तक विरोध की आग धधक रही है। सवाल यह है कि यदि इस्तीफा देने से विरोध थम सकता है, तो फिर सरकार और भाजपा इस कदम से क्यों बच रही है?

जानकारों के अनुसार, इसके पीछे चार मुख्य रणनीतिक कारण हैं।

1. दबाव में झुकने का नैरेटिव नहीं चाहती सरकार मोदी सरकार इस बात को लेकर बेहद सतर्क है कि वह किसी भी दबाव में कार्य करती हुई न दिखे। यूपीए सरकार के दौर में लगातार हुए इस्तीफों ने उनकी छवि को नकारात्मक रूप दिया था। मोदी सरकार उसी से सबक लेते हुए यह दिखाना चाहती है कि वह सिस्टम में सुधार कर रही है, न कि विरोध के सामने झुक रही है।

2. आरोपों पर इस्तीफे की अघोषित नीति मोदी सरकार ने पिछले एक दशक में यह स्पष्ट परंपरा बना ली है कि केवल आरोपों के आधार पर मंत्री का इस्तीफा नहीं लिया जाएगा। चाहे वह अजय मिश्रा टेनी का मामला हो या स्मृति ईरानी का, सरकार ने विपक्ष की भारी मांग के बावजूद मंत्रियों को नहीं हटाया। यह उनकी एक अघोषित नीति बन चुकी है, जिससे वे पीछे हटने के मूड में नहीं हैं।

3. संगठन और संघ में प्रधान की मजबूत पकड़ धर्मेंद्र प्रधान भाजपा के एक पुराने और भरोसेमंद नेता हैं। छात्र जीवन से ही एबीवीपी और संघ के साथ उनकी गहरी पैठ रही है। उज्ज्वला योजना जैसे मोदी सरकार के फ्लैगशिप कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक जमीन पर उतारने में उनकी बड़ी भूमिका रही है। ऐसे में पार्टी उन्हें एक लॉयल (वफादार) और गंभीर नेता मानती है।

4. राजनीतिक आकलन का इंतजार सरकार किसी भी बड़े आंदोलन पर निर्णय लेने से पहले उसके दीर्घकालिक राजनीतिक प्रभाव का आंकलन करती है। जब तक आंदोलन का असर व्यापक और वोट बैंक पर सीधा खतरा नहीं बनता, तब तक सरकार कोई बड़ा कदम नहीं उठाती। सरकार फिलहाल यह देख रही है कि आम जनता में इस मुद्दे को लेकर कितना जनाक्रोश है।

क्या इस्तीफे की कोई संभावना है? भले ही अभी इस्तीफा न हो, लेकिन राजनीतिक गलियारों में भविष्य के लिए कुछ विकल्पों पर चर्चा हो रही है। यदि दबाव बहुत अधिक बढ़ता है, तो सरकार सुरेश प्रभु मॉडल अपना सकती है। जिस तरह 2017 में रेल हादसों के बाद प्रभु को मंत्रालय से हटाकर वाणिज्य मंत्री बनाया गया था, प्रधान को भी भविष्य में किसी अन्य मंत्रालय में भेजा जा सकता है या उन्हें संगठन की जिम्मेदारी दी जा सकती है।

फिलहाल, सरकार का रुख स्पष्ट है: वह सिस्टम के भीतर प्रशासनिक सुधार (जैसे एनटीए में नए अधिकारियों की नियुक्ति) पर जोर दे रही है, न कि इस्तीफे की मांग मानकर अपनी साख पर सवाल उठाने पर।

कुछ अन्य वेब स्टोरीज

Story 1

क्या मुंबई इंडियंस में फिर होगी हिटमैन की वापसी? नीता अंबानी से मुलाकात ने बढ़ाई हलचल

Story 1

सूरत में बारिश का तांडव : जलभराव में फंसी एम्बुलेंस, रास्ता न मिलने पर वापस मुड़ना पड़ा मजबूर

Story 1

NEET पेपर लीक पर गरमाई सियासत: बातचीत के लिए तैयार CJP, सरकार के सामने रखी ये शर्त

Story 1

FIH हॉकी वर्ल्ड कप 2026: हरमनप्रीत की कमान, पाकिस्तान से टक्कर और 51 साल का सूखा खत्म करने उतरेगी टीम इंडिया

Story 1

AI ने बनाया AI को निशाना: OpenAI के एजेंट ने Hugging Face को किया हैक , दुनिया में हड़कंप

Story 1

अमेज़न की ओपन बॉक्स फीस पर छिड़ा विवाद: क्या डिलीवरी के नाम पर ग्राहकों से हो रही वसूली?

Story 1

गंभीर की अनदेखी, कुलदीप का बड़ा दांव; अब इंग्लिश काउंटी में दिखाएंगे अपना जलवा

Story 1

हेटमायर-रदरफोर्ड का तूफान, वेस्टइंडीज ने जीता आखिरी वनडे, लेकिन सीरीज पर न्यूजीलैंड का कब्जा

Story 1

नीट विवाद के बीच दिल्ली में हलचल: मोदी से मिले शरद पवार, संसद से सड़क तक संग्राम

Story 1

भोजशाला विवाद: सुप्रीम कोर्ट पहुंचा नमाज स्थल का मामला, शुक्रवार को होगी अहम सुनवाई