मानसून सत्र से पहले विपक्षी एकता में दरार: परिसीमन बिल पर सुप्रिया सुले के बयान से INDIA गठबंधन में बवाल
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संसद का मानसून सत्र शुरू होने से ठीक पहले विपक्षी गठबंधन INDIA में भारी खींचतान देखने को मिल रही है। केंद्र सरकार द्वारा लाए जाने वाले संभावित परिसीमन बिल पर सहयोगी दलों के सुर अलग-अलग होते दिख रहे हैं, जिससे गठबंधन की एकजुटता पर सवाल खड़े हो गए हैं।

सुप्रिया सुले के बयान से मची हलचल विवाद की शुरुआत एनसीपी (शरदचंद्र पवार) की कार्यकारी अध्यक्ष सुप्रिया सुले के उस बयान से हुई, जिसमें उन्होंने लोकसभा सीटों के पुनर्गठन का समर्थन किया। सुले ने कहा कि अगर परिसीमन के तहत सभी राज्यों में सीटों की संख्या समान रूप से 50% बढ़ाई जाती है, तो उनकी पार्टी इसका विरोध नहीं करेगी। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस, डीएमके और शिवसेना (यूबीटी) ने भी इस पर सकारात्मक रुख दिखाया है।

संजय राउत का कड़ा पलटवार सुले के इस एकतरफा बयान से शिवसेना (यूबीटी) के वरिष्ठ नेता संजय राउत भड़क गए। नागपुर में मीडिया से बात करते हुए राउत ने दोटूक लहजे में कहा कि परिसीमन जैसे गंभीर राष्ट्रीय मुद्दे पर कोई भी दल अकेले फैसला नहीं ले सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि गठबंधन में कोई भी पार्टी अपना निर्णय बाकी सहयोगियों पर थोप नहीं सकती। भविष्य में जो भी रुख तय होगा, वह सभी दलों की आपसी चर्चा के बाद ही लिया जाएगा।

क्या कांग्रेस अलग-थलग पड़ जाएगी? कांग्रेस लंबे समय से परिसीमन बिल का कड़ा विरोध करती रही है। हालांकि, सुप्रिया सुले के दावे ने कांग्रेस को असहज कर दिया है। इधर, डीएमके का रुख भी अब पहले के मुकाबले नरम माना जा रहा है। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद के बदलते समीकरणों के चलते यह चर्चा तेज है कि डीएमके सरकार के इस कदम पर पीछे हट सकती है।

सरकार की राह हुई आसान? गणित की बात करें, तो मौजूदा लोकसभा में एनडीए के पास 293 सांसद हैं। यदि इसमें एनसीपी (एसपी) और शिवसेना (यूबीटी) के बागी या तटस्थ सांसदों को शामिल किया जाता है, तो यह आंकड़ा 332 तक पहुंच सकता है।

संवैधानिक संशोधन के लिए दो-तिहाई बहुमत यानी 360 सीटों की आवश्यकता होती है। यदि सरकार को डीएमके के 22 सांसदों का समर्थन अप्रत्यक्ष रूप से भी मिल जाता है, तो मोदी सरकार के लिए परिसीमन बिल पास कराना काफी आसान हो जाएगा।

निष्कर्ष मानसून सत्र से पहले गठबंधन के भीतर की यह कलह मोदी सरकार के लिए एक बड़ा अवसर बन सकती है। अगर विपक्ष इस मुद्दे पर एक साझा राय नहीं बना पाता है, तो सदन में कांग्रेस को अकेले पड़ने का खतरा बढ़ सकता है।

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