बंद कमरे में हुई बघेल-चन्नी की मुलाकात, क्या पंजाब कांग्रेस में फिर फटने वाला है सियासी ज्वालामुखी?
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पंजाब विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले कांग्रेस की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। राज्य में गुटबाजी चरम पर है और सीएम चेहरे को लेकर चल रही खींचतान अब आर-पार की स्थिति में पहुंच गई है। शनिवार को पंजाब कांग्रेस के नए प्रभारी भूपेश बघेल और पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के बीच हुई बंद कमरे की बैठक इसी गहरे संकट का प्रतीक है।

मुलाकात के बाद चन्नी का तेल वाला तंज बैठक के बाद कोई संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं हुई, जिससे यह साफ है कि दोनों के बीच सहमति नहीं बन पाई है। चन्नी ने मीडिया के सामने मुस्कुराते हुए कहा, अभी तो तेल देखो और तेल की धार देखो। उनके इस बयान ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। यह सीधा संकेत है कि चन्नी पार्टी आलाकमान की हर चाल पर नजर रखे हुए हैं और भविष्य में अपना स्टैंड उसी के आधार पर तय करेंगे।

टिकट और सीएम चेहरे पर चन्नी की मांग सूत्रों के मुताबिक, चन्नी ने भूपेश बघेल के सामने स्पष्ट शर्तें रखी हैं। चन्नी का जोर इस बात पर है कि पार्टी को चुनाव से पहले ही मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित कर देना चाहिए, ताकि दलित वोट बैंक (लगभग 32%) और कार्यकर्ताओं में भ्रम की स्थिति न रहे। साथ ही, उन्होंने संगठन में वरिष्ठ नेताओं और उनके समर्थकों की अनदेखी पर भी नाराजगी जताई है।

क्या सिद्धू और चन्नी एक साथ? चन्नी और नवजोत सिंह सिद्धू जैसे वरिष्ठ नेता वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग की कार्यप्रणाली से खुश नहीं हैं। चन्नी ने बघेल को याद दिलाया कि पिछली बार आपसी कलह और अंतिम समय में लिए गए फैसलों के कारण ही कांग्रेस को सत्ता से हाथ धोना पड़ा था। अगर इस बार भी वही गलती दोहराई गई, तो पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

बघेल की अग्निपरीक्षा इधर, भूपेश बघेल ने दावा किया है कि सभी नेता हाईकमान के फैसले का पालन करने पर सहमत हैं। हालांकि, अपनी खुद की राजनीति में ढाई-ढाई साल के सीएम फॉर्मूले का दर्द झेल चुके बघेल के लिए पंजाब की गुटबाजी को संभालना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। उन्होंने नेताओं को मान-सम्मान का भरोसा तो दिया है, लेकिन जमीनी स्तर पर यह कितना कारगर होगा, यह बड़ा सवाल है।

आगे क्या होगा? फिलहाल कांग्रेस का पूरा मामला वेट एंड वॉच की स्थिति में है। चन्नी का यह रुख साफ करता है कि अगर पार्टी ने उनकी मांगों को नजरअंदाज किया, तो पंजाब कांग्रेस में एक बार फिर बगावत के सुर तेज हो सकते हैं। आने वाले कुछ सप्ताह यह तय करेंगे कि बघेल गुटबाजी को थामने में सफल होते हैं या पंजाब कांग्रेस फिर से अपने सबसे पुराने दुश्मन अंतर्कलह की भेंट चढ़ जाती है।

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