गैलीपोली की वो खूनी जंग, जहां भारतीय जवानों ने न्यूजीलैंड के सैनिकों के साथ मिलकर लिखी थी वीरता की इबारत
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की न्यूजीलैंड यात्रा ने एक बार फिर इतिहास के उन पन्नों को चर्चा में ला दिया है, जहां भारतीय सैनिकों का शौर्य पूरी दुनिया में गूंजा था। क्या आप जानते हैं कि भारत और न्यूजीलैंड के बीच एक ऐसा सैन्य इतिहास जुड़ा है, जो प्रथम विश्व युद्ध के दौरान गैलीपोली की कठिन जंग में लिखा गया था?

क्या था गैलीपोली अभियान? प्रथम विश्व युद्ध के दौरान गैलीपोली एक बेहद चुनौतीपूर्ण और निर्णायक सैन्य अभियान था। यह युद्ध आधुनिक तुर्किये के गैलीपोली प्रायद्वीप में लड़ा गया था। 25 अप्रैल 1915 को शुरू हुआ यह अभियान जनवरी 1916 तक चला। इसका मुख्य उद्देश्य डार्डानेल्स जलमार्ग पर कब्जा करना था, ताकि भूमध्य सागर से काला सागर तक पहुंच आसान हो सके और रूस की मदद की जा सके।

क्यों लड़ने पड़ा था भारतीय सैनिकों को? उस समय भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। ब्रिटिश भारतीय सेना मित्र राष्ट्रों (ब्रिटेन, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड) का अहम हिस्सा थी। भारतीय सैनिकों को उनके अदम्य साहस, पहाड़ी इलाकों में लड़ने के अनुभव और कठिन परिस्थितियों में टिके रहने की क्षमता के कारण गैलीपोली भेजा गया था। इसमें सिख, गोरखा, पठान और पंजाबी मुसलमान रेजिमेंट शामिल थे।

न्यूजीलैंड और भारत का जुड़ाव गैलीपोली में न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के सैनिकों को एएनज़ैक (ANZAC) कहा जाता था। भारतीय सैनिक और एएनज़ैक सैनिक एक ही मित्र राष्ट्र गठबंधन का हिस्सा थे। हालांकि वे अलग-अलग मोर्चों पर थे, लेकिन उनका साझा उद्देश्य और एक ही युद्ध क्षेत्र में उपस्थिति ने दोनों देशों की सैन्य विरासत को एक-दूसरे से जोड़ दिया।

14वीं फिरोजपुर सिख रेजिमेंट का पराक्रम गैलीपोली की लड़ाई में 14वीं फिरोजपुर सिख रेजिमेंट की वीरता सैन्य इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है। जून 1915 में क्रिथिया क्षेत्र की भीषण लड़ाई में इन जवानों ने मशीनगनों और तोपों की बौछार के बीच अद्भुत साहस दिखाया। कई जवान घायल होने के बाद भी आखिरी सांस तक लड़ते रहे। उनका बलिदान आज भी दुनिया भर के सैन्य इतिहासकारों के बीच सम्मान के साथ याद किया जाता है।

युद्ध का परिणाम और इतिहास गैलीपोली अभियान मित्र राष्ट्रों के लिए सफल नहीं रहा और उन्हें अंततः पीछे हटना पड़ा। हालांकि, इस युद्ध ने तुर्किये में आधुनिक राष्ट्रपिता मुस्तफा कमाल अतातुर्क के उदय का मार्ग प्रशस्त किया। वहीं, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के लिए यह अभियान उनकी राष्ट्रीय पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।

क्यों आज भी याद किए जाते हैं भारतीय जवान? गैलीपोली की तपती रेत और सर्द रातों में भारतीय सैनिकों ने जो अनुशासन दिखाया, वह मिसाल है। यह युद्ध हमें याद दिलाता है कि प्रथम विश्व युद्ध केवल यूरोपीय देशों का संघर्ष नहीं था, बल्कि इसमें भारत ने भी अपने हजारों बेटों का बलिदान देकर विश्व इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया था। आज पीएम मोदी की न्यूजीलैंड यात्रा उसी पुरानी दोस्ती और साझा सैन्य गौरव को याद करने का एक अवसर भी है।

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