यूरेनियम डील का श्रेय कौन? भाजपा-कांग्रेस में छिड़ी तीखी जुबानी जंग
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऑस्ट्रेलिया दौरे के दौरान भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुए यूरेनियम निर्यात समझौते ने देश की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। इस डील के श्रेय को लेकर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस आमने-सामने हैं।

भाजपा का दावा: मोदी के नेतृत्व की बड़ी उपलब्धि भाजपा आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने सोशल मीडिया पर इस समझौते को प्रधानमंत्री मोदी की बड़ी जीत बताया है। मालवीय का तर्क है कि 2010 में ऑस्ट्रेलिया ने भारत के परमाणु अप्रसार संधि (NPT) पर हस्ताक्षर न करने का हवाला देकर यूरेनियम देने से साफ इनकार कर दिया था। अब मोदी सरकार के दौर में यह समझौता होना भारत की बदली हुई वैश्विक छवि और भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार के रूप में पहचान को दर्शाता है।

कांग्रेस का पलटवार: होमवर्क करें भाजपाई कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भाजपा के दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने तीखा हमला करते हुए कहा कि भाजपा का पूरा तंत्र झूठ फैला रहा है। रमेश ने स्पष्ट किया कि इस समझौते की नींव काफी पहले रखी गई थी।

तथ्यों की लड़ाई: क्या है कांग्रेस का आधार? जयराम रमेश ने आधिकारिक दस्तावेजों और पुरानी मीडिया रिपोर्ट्स का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि 4 दिसंबर 2011 को तत्कालीन ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड ने अपनी लेबर पार्टी से भारत को यूरेनियम बेचने की मंजूरी हासिल कर ली थी। यह प्रक्रिया 2008 के भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते के बाद गति पकड़ चुकी थी।

सोशल मीडिया पर क्रेडिट वॉर जयराम रमेश ने भाजपा प्रवक्ताओं और सांसदों को ट्रोल करार देते हुए सलाह दी कि वे कोई भी दावा करने से पहले अपना होमवर्क ठीक से करें। उन्होंने 2011 की मीडिया रिपोर्ट्स के स्क्रीनशॉट साझा कर यह साबित करने की कोशिश की कि इस ऐतिहासिक डील का रास्ता बहुत पहले ही साफ हो चुका था।

सियासी तकरार के मायने आगामी रणनीतिक और कूटनीतिक उपलब्धियों को लेकर दोनों पार्टियां अपने-अपने दावे पेश कर रही हैं। जहां भाजपा इसे मोदी सरकार के मजबूत नेतृत्व से जोड़कर देख रही है, वहीं कांग्रेस इसे पिछली सरकारों की कूटनीतिक निरंतरता का परिणाम बता रही है। यह बहस राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है।

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