ऑस्ट्रेलिया-भारत का नया परमाणु करार: क्या 2047 तक भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता का सपना होगा पूरा?
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऑस्ट्रेलिया यात्रा के दौरान हुए एक अहम परमाणु समझौते ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को नई दिशा दी है। इस समझौते के तहत, ऑस्ट्रेलिया अब भारत को यूरेनियम की आपूर्ति करेगा, जो भारत के परमाणु ऊर्जा लक्ष्यों को हासिल करने में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।

स्वच्छ ऊर्जा और 100 गीगावाट का लक्ष्य भारत ने साल 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा उत्पादन का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। वर्तमान में भारत लगभग 8 गीगावाट परमाणु ऊर्जा का उत्पादन कर रहा है। ऑस्ट्रेलिया के पास दुनिया का करीब 32 प्रतिशत यूरेनियम भंडार है। इस समझौते से भारत को अपने परमाणु रिएक्टरों के लिए ईंधन की कमी नहीं होगी, जिससे कोयले जैसे जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम होगी और स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में भारत तेज़ी से आगे बढ़ेगा।

सुरक्षा और शांतिपूर्ण उद्देश्यों पर ज़ोर दोनों देशों ने स्पष्ट किया है कि यह यूरेनियम निर्यात केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए होगा। यह पूरी आपूर्ति अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के तय सुरक्षा मानकों के दायरे में रहेगी। यह समझौता न केवल व्यापारिक है, बल्कि दोनों देशों के बीच गहराते रणनीतिक और रक्षा सहयोग को भी दर्शाता है। हिंद महासागर में अंतरिक्ष ट्रैकिंग टर्मिनल बनाने का निर्णय भी इस बढ़ती साझेदारी का प्रमाण है।

सियासी बयानबाजी और अतीत की गूंज समझौते के बाद श्रेय लेने की होड़ भी दिखी। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इसे 2008 के भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते का परिणाम बताया। वहीं, जानकारों का कहना है कि 2014 के बाद से ही इस दिशा में काम चल रहा था, लेकिन अब जाकर यह धरातल पर उतरा है। सरकार का नया SHANTI विधेयक भी इस दिशा में बड़ा कदम है, जो निजी कंपनियों को भी परमाणु रिएक्टर बनाने की अनुमति देता है।

क्यों ज़रूरी है यह समझौता? विज्ञान मामलों के जानकार पल्लव बागला के अनुसार, भारत के पास परमाणु बम बनाने के लिए पर्याप्त यूरेनियम मौजूद है, लेकिन ऊर्जा उत्पादन के लिए बाहरी स्रोतों पर निर्भरता ज़रूरी है। रूस और कनाडा के बाद ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम मिलना भारत की ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से एक बड़ी उपलब्धि है।

आर्थिक और जनसांख्यिकीय बदलाव यह समझौता केवल यूरेनियम तक सीमित नहीं है, बल्कि दोनों देशों के बीच बढ़ते मानवीय और कूटनीतिक रिश्तों को भी रेखांकित करता है। ऑस्ट्रेलिया में भारतीय मूल के लोग अब वहां का सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय बन चुके हैं, जो मोदी और अल्बनीज़ के बीच मैत्री को और अधिक प्रगाढ़ बना रहा है।

निष्कर्ष भारत के लिए यह समझौता महज ईंधन की खरीद नहीं, बल्कि भविष्य की उस ऊर्जा सुरक्षा का आधार है, जो 2047 के विकसित भारत के विजन के लिए अनिवार्य है। विशेषज्ञों का मानना है कि परमाणु ऊर्जा की बढ़ती क्षमता भारत के औद्योगिक विकास और डेटा केंद्रों की निरंतर बिजली ज़रूरतों को पूरा करने में एक गेम-चेंजर साबित होगी।

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