बांकीपुर जीतने के लिए पीके का 24 घंटे वाला चक्रव्यूह : क्या ढह जाएगा पारंपरिक राजनीति का किला?
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बिहार की राजनीति में बांकीपुर उपचुनाव का पारा चरम पर है। चुनावी बिसात बिछाने के माहिर प्रशांत किशोर अब खुद इस रणभूमि में उतरे हैं। पारंपरिक रैलियों और लाउडस्पीकर के शोर से दूर, पीके ने बांकीपुर में एक बेहद हाईटेक और साइलेंट रणनीति तैयार की है, जो सुबह 6 बजे से आधी रात तक लगातार चल रही है।

सुबह का संवाद: यूथ विंग और मॉर्निंग वॉकर्स प्रशांत किशोर की टीम का दिन सुबह 6 बजे शुरू हो जाता है। उनकी यूथ विंग पार्कों और चाय की दुकानों पर जाकर मॉर्निग वॉक करने वाले बुजुर्गों और नौकरीपेशा लोगों से सीधे जुड़ती है। यहाँ चर्चा जाति-धर्म पर नहीं, बल्कि जलजमाव, ट्रैफिक और बदहाल ड्रेनेज सिस्टम जैसे स्थानीय मुद्दों पर होती है।

दोपहर का प्रहार: महिला ब्रिगेड का घर-घर दस्तक सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे तक महिला ब्रिगेड की टीम बांकीपुर के घरों में दस्तक देती है। इनका निशाना घर की महिलाएं यानी साइलेंट वोटर हैं। ये टीम रसोई के बजट, बच्चों की महंगी पढ़ाई और रोजगार जैसे मुद्दों पर चर्चा कर महिलाओं को जन सुराज के विजन से जोड़ रही है।

शाम का तंज: नुक्कड़ नाटक और फ्लैश मॉब शाम 5 बजे से रात 8 बजे के बीच कंकड़बाग और बोरिंग रोड जैसे व्यस्त चौराहों पर सांस्कृतिक टीमें नुक्कड़ नाटकों के जरिए राजनीतिक कटाक्ष कर रही हैं। मनोरंजन के माध्यम से बीते 30 वर्षों की राजनीति की कमियों को युवाओं के सामने बेहद दिलचस्प तरीके से रखा जा रहा है।

रात की चौपाल: पीके खुद मैदान में रात 8 बजे से आधी रात तक प्रशांत किशोर खुद पदयात्रा करते हैं। वे किसी मंच पर नहीं, बल्कि जमीन पर बैठकर रात की चौपाल लगाते हैं। यहाँ कोई भाषण नहीं, बल्कि आम जनता के तीखे सवालों का सीधा समाधान होता है। पीके तंग गलियों में घूमकर व्यक्तिगत संवाद पर जोर दे रहे हैं।

चुनावी एजेंडा और सीधा मुकाबला पीके सोशल मीडिया पर #BadloBihar और #BankipurKaBeta जैसे कैंपेन चला रहे हैं। उनके वादों में ड्रेनेज का वैज्ञानिक समाधान, डिजिटल स्किलिंग हब और स्टार्टअप सेंटर शामिल हैं। पीके का सीधा निशाना बीजेपी का 30 साल पुराना गढ़ और विपक्ष की जातिगत राजनीति है।

बांकीपुर की जनता अब यह तय करेगी कि क्या वे दशकों पुराने ढर्रे के साथ चलेंगे या प्रशांत किशोर के इस आधुनिक 24 घंटे वाले चक्रव्यूह पर भरोसा जताएंगे। यह चुनाव केवल एक सीट की लड़ाई नहीं, बल्कि बिहार की बदली हुई राजनीतिक दिशा का लिटमस टेस्ट बन गया है।

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