मौत के 4 महीने बाद अंतिम संस्कार: आखिर कैसे सुरक्षित रखा जाता है शव?
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ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई का राजकीय अंतिम संस्कार 4 जुलाई से 9 जुलाई के बीच हो रहा है। चौंकाने वाली बात यह है कि उनकी मौत 28 फरवरी को एक हवाई हमले में हुई थी। 4 महीने बाद हो रहे इस अंतिम संस्कार ने दुनिया भर में यह बहस छेड़ दी है कि आखिर किसी शव को इतने लंबे समय तक गलने से कैसे बचाया जा सकता है?

शव सड़ने की प्रक्रिया और समयसीमा

इंसान की मौत के कुछ घंटों बाद ही शरीर में बदलाव शुरू हो जाते हैं। मौत के 2 घंटे के भीतर शरीर अकड़ने लगता है, और 24 घंटे के अंदर बैक्टीरिया शरीर को अंदर से डैमेज करना शुरू कर देते हैं। सामान्य परिस्थितियों में, घर पर बिना किसी खास तैयारी के शव को 6 से 10 घंटे तक ही सुरक्षित रखा जा सकता है। गर्मी में यह समय घटकर 4-6 घंटे रह जाता है।

शव को सुरक्षित रखने के तीन मुख्य तरीके

वैज्ञानिक तकनीकें शरीर को सड़ने से बचाने के लिए बैक्टीरिया के विकास को पूरी तरह रोक देती हैं या बहुत धीमा कर देती हैं:

1. कोल्ड स्टोरेज (अल्पकालिक सुरक्षा): अस्पतालों की मॉर्च्युरी में शवों को 2°C से 4°C के तापमान पर रखा जाता है। अगर आइस पैक या खास पॉलीमर शीट का इस्तेमाल किया जाए, तो शव को सामान्य तौर पर 4 दिनों तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

2. एम्बामिंग (Embalming - हफ्तों से महीनों तक की सुरक्षा): यह सबसे प्रचलित तकनीक है। इसमें सर्जरी के जरिए शरीर से सारा खून निकाल दिया जाता है और उसकी जगह फॉर्मेल्डिहाइड-बेस्ड केमिकल सॉल्यूशन भरा जाता है। यह प्रक्रिया शरीर के प्रोटीन और ऊतकों (tissues) को कीटाणु-मुक्त कर देती है, जिससे बैक्टीरिया नहीं पनप पाते। सही तरीके से की गई एम्बामिंग शव को 26 हफ्तों (करीब 6 महीने) तक सुरक्षित रख सकती है। मेडिकल कॉलेजों में दान किए गए शवों को इसी तकनीक का उपयोग करके महीनों तक अध्ययन के लिए रखा जाता है।

3. क्रायोप्रिजर्वेशन (दशकों तक सुरक्षा): यह सबसे जटिल प्रक्रिया है, जिसमें शरीर को -130°C से भी नीचे के तापमान पर लिक्विड नाइट्रोजन में रखा जाता है। इस प्रक्रिया में बैक्टीरिया के पनपने की कोई गुंजाइश नहीं रहती। इस तकनीक के जरिए शव को दशकों या उससे भी अधिक समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

प्राकृतिक शीतलन का प्रभाव

तकनीकी हस्तक्षेप के अलावा, प्रकृति भी शव को संरक्षित रखने का काम करती है। यदि शरीर अत्यधिक ठंडे वातावरण जैसे ग्लेशियरों में रहे, तो वह सैकड़ों साल तक सुरक्षित रह सकता है। इसका जीता-जागता उदाहरण 1968 में लापता हुए भारतीय वायुसेना के उस जवान का शव है, जो 56 साल बाद रोहतांग दर्रे की बर्फ में बिल्कुल सही स्थिति में मिला था।

खामेनेई के मामले में, एम्बामिंग और कोल्ड स्टोरेज जैसी आधुनिक तकनीकों का संयोजित उपयोग ही वह कारण है जिसके चलते 4 महीने बाद भी पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए रखा जा सका है।

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