HDFC बैंक की नई नियुक्त‍ि पर छिड़ा घमासान, क्या राजीव कुमार का चयन बना मुसीबत?
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देश का सबसे बड़ा प्राइवेट बैंक, एचडीएफसी, इन दिनों एक बार फिर सुर्खियों में है। बैंक ने अपने नए पार्ट-टाइम चेयरमैन के रूप में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) राजीव कुमार के नाम का ऐलान क्या किया, इंटरनेट पर विवादों की बाढ़ आ गई है। बैंक के इस फैसले को लेकर आम यूजर्स से लेकर रिटायर्ड अधिकारियों तक ने नाराजगी जताई है।

आखिर फैसला क्या है?

एचडीएफसी बैंक के पूर्व चेयरमैन के पद छोड़ने के बाद से ही बैंक नए बॉस की तलाश में था। 29 जून को बैंक ने घोषणा की कि वे राजीव कुमार को 4 साल के लिए पार्ट-टाइम चेयरमैन नियुक्त करने जा रहे हैं। हालांकि, इस नियुक्ति के लिए अभी भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की अंतिम मंजूरी मिलनी बाकी है।

क्यों हो रहा है विरोध?

राजीव कुमार 1984 बैच के आईएएस अधिकारी रहे हैं और वित्त सचिव के तौर पर काम कर चुके हैं। बैंक का तर्क है कि उनके पास फाइनेंस और पॉलिसी मेकिंग का लंबा अनुभव है। लेकिन आलोचकों का मानना है कि बैंकिंग जगत में कई अनुभवी दिग्गज मौजूद थे, जिन्हें नजरअंदाज कर सीधे एक सिविल सर्वेंट को कमान सौंप दी गई, जिनका बैंकिंग बैकग्राउंड न के बराबर है।

सोशल मीडिया पर तूफान

इंटरनेट यूजर्स ने इस नियुक्ति को पूरी तरह राजनीतिक करार दिया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मनीष नाम के एक यूजर ने इसे बैंक खाताधारकों के लिए चेतावनी बताया है। लोगों का कहना है कि उनकी नियुक्ति किसी पेशेवर योग्यता के बजाय राजनीतिक कारणों से प्रेरित है, ताकि सरकार का प्राइवेट बैंकों पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण बना रहे।

रिटायर्ड आईपीएस ने भी उठाए सवाल

रिटायर्ड आईपीएस एम. नागेश्वर राव ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने साफ कहा कि बैंक को ऐसे लोगों की जरूरत है जो पेशेवर तरीके से बैंकिंग सुधार सके, न कि किसी पूर्व नौकरशाह की। उन्होंने इस नियुक्ति को संदिग्ध बताते हुए कहा कि यह देश के सबसे बड़े प्राइवेट लेंडर की साख के लिए सही नहीं है।

पेंशन और सैलरी पर भी चर्चा

विवाद सिर्फ अनुभव को लेकर ही नहीं, बल्कि आर्थिक पहलू पर भी है। कई यूजर्स ने हिसाब लगाया है कि राजीव कुमार को सरकारी पेंशन के साथ-साथ बैंक से मिलने वाला वेतन भी मिलेगा। लोगों का कहना है कि तमाम नामी बैंकर्स को किनारे कर उन्हें यह पद देना कई तरह के अनसुलझे सवाल खड़े कर रहा है।

फिलहाल, सोशल मीडिया पर चल रही यह बहस इस बात का संकेत है कि देश का सबसे बड़ा बैंक अब जनता की कड़ी निगरानी में है। अब सबकी निगाहें आरबीआई के रुख पर टिकी हैं कि क्या वह इस विवादित नियुक्ति को हरी झंडी देता है या नहीं।

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