यूरोप बना आग का गोला : रिकॉर्ड तोड़ गर्मी से बेहाल महाद्वीप, अस्पतालों में भीड़ और कब्रिस्तानों में जगह कम
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यूरोप इस समय अपने इतिहास की सबसे भीषण गर्मी का सामना कर रहा है। लगातार बढ़ते तापमान ने पुराने सभी रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं। कई देशों में हालात चिंताजनक हैं, जहाँ अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ रही है और मौतों का आंकड़ा भी तेजी से ऊपर जा रहा है।

WHO की चेतावनी: 15 करोड़ लोग खतरे में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के प्रमुख टेड्रोस अदनोम गेब्रेयेसस ने चेतावनी दी है कि यूरोप दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप है। यह क्षेत्र वैश्विक औसत से दोगुनी रफ्तार से गर्म हो रहा है। फिलहाल भीषण गर्मी की चपेट में 15 करोड़ लोग हैं, जिसके चलते कई देशों में स्कूल बंद करने पड़े हैं और बिजली ग्रिड पर भारी दबाव बना हुआ है।

पिघल रही पटरियां और सड़कों पर वाटर कैनन गर्मी का असर बुनियादी ढांचे पर साफ दिख रहा है। जर्मनी के लीपज़िग में पटरियां पिघलने के कारण ट्राम सेवाएं ठप हो गईं। वहीं, बर्लिन में बढ़ती तपिश से राहत देने के लिए पुलिस को सड़कों पर वाटर कैनन का सहारा लेना पड़ा। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में लोग धूप में बर्तन रखे बिना अंडे पकाते और सामान पिघलते हुए साफ देख सकते हैं।

फ्रांस में मौतों का आंकड़ा बढ़ा, भर गए कब्रिस्तान फ्रांस की स्थिति सबसे ज्यादा नाज़ुक है। जून के आखिरी सप्ताह से अब तक यहाँ सामान्य से करीब 1,000 ज्यादा मौतें दर्ज की गई हैं। राष्ट्रीय अंतिम संस्कार संघ के अनुसार, शवदाह गृहों और कब्रिस्तानों पर काम का बोझ 60% से ज्यादा बढ़ गया है। पेरिस में कब्रिस्तान पूरी तरह भर चुके हैं, जिससे परिजनों को अंतिम संस्कार के लिए मीलों दूर ग्रामीण इलाकों में जाना पड़ रहा है।

युद्ध के बीच यूक्रेन पर बिजली संकट की मार रूस के साथ जारी युद्ध के चलते पहले से ही जर्जर हो चुके यूक्रेन के बिजली ग्रिड पर भीषण गर्मी ने दोहरी मार दी है। रिव्ने समेत 5 प्रमुख प्रांतों में बिजली के लंबे घंटों तक ब्लैकआउट की चेतावनी जारी की गई है। ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार, युद्ध के बीच बचे हुए बिजली संयंत्रों के लिए यह गर्मी सबसे बड़ी चुनौती साबित हो रही है।

साइलेंट किलर बनी गर्मी यूरोप के कई देशों में तापमान 40 से 42 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया है। WHO ने इसे साइलेंट किलर करार दिया है, क्योंकि यूरोप के अधिकांश घरों और स्कूलों में एयर कंडीशनिंग की सुविधा नहीं है। लोग इस भीषण गर्मी से बचने का कोई सुरक्षित स्थान नहीं ढूंढ पा रहे हैं।

यह आपदा संकेत देती है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की नहीं, बल्कि आज की सबसे बड़ी चुनौती है। यदि पर्यावरण के प्रति ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो विकसित देशों को भी आने वाले सालों में ऐसे ही और भी भयावह संकटों से जूझना पड़ सकता है।

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