सुपौल: जहां मानसून आते ही कैद हो जाती है जिंदगी, नाव ही बनी हजारों परिवारों का एकमात्र सहारा
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कोसी का हर साल का संघर्ष देश के ज्यादातर हिस्सों में मानसून खुशहाली लेकर आता है, लेकिन बिहार के कोसी तटबंध के भीतर बसे हजारों परिवारों के लिए बारिश का मौसम चार महीने की कैद जैसी त्रासदी लेकर आता है। पहली तेज बारिश होते ही सड़कें जलमग्न हो जाती हैं और गांव बाहरी दुनिया से पूरी तरह कट जाते हैं।

सड़कें गायब, नाव ही जीवन रेखा सुपौल, किशनपुर, सरायगढ़, निर्मली और मरौना प्रखंड के दर्जनों गांव हर साल बाढ़ और कटाव की चपेट में आ जाते हैं। स्थिति इतनी विकट हो जाती है कि लोगों का अस्पताल, बाजार और सरकारी दफ्तरों तक पहुंचना बंद हो जाता है। ऐसे में लकड़ी की छोटी नावें ही लोगों की इकलौती उम्मीद बनती हैं। ये नावें सिर्फ आवागमन का साधन नहीं, बल्कि एंबुलेंस और स्कूल बस की भूमिका भी निभाती हैं।

इलाज और शिक्षा पर बुरा असर स्थानीय ग्रामीण रामजी यादव बताते हैं कि नाव के बिना मरीज को अस्पताल ले जाना नामुमकिन सा हो जाता है। कई बार गर्भवती महिलाओं को समय पर इलाज नहीं मिल पाता, जो जानलेवा साबित होता है। वहीं, बच्चों की पढ़ाई भी पूरी तरह ठप हो जाती है। डर के कारण कई अभिभावक बच्चों को घर से बाहर नहीं भेजते, जिससे शिक्षा का स्तर भी प्रभावित हो रहा है।

सरकारी नाकामी और लोगों का जिम्मा सरकारी नावों की संख्या जरूरत के मुकाबले बेहद कम है। यही कारण है कि ग्रामीण अपनी जमा-पूंजी लगाकर खुद नाव बनवाते हैं। रीता देवी जैसी स्थानीय निवासी कहती हैं कि हर साल बाढ़ से पहले उनकी सबसे बड़ी चिंता नाव की उपलब्धता होती है। अगर नाव नहीं, तो पूरा परिवार घर में नजरबंद होकर रह जाता है।

नाव बनाना हुआ महंगा, पर मजबूरी बरकरार नाव निर्माण की लागत में भारी इजाफा हुआ है। कारीगर विजय पासी बताते हैं कि जो नाव पहले 10 हजार रुपये में तैयार हो जाती थी, अब उसकी लागत 40-50 हजार रुपये तक पहुंच गई है। जलेबी और जामुन की लकड़ी से बनाई जाने वाली ये नावें मानसून की शुरुआत से पहले पूरी तरह तैयार कर ली जाती हैं। बढ़ती महंगाई के बावजूद, इन नावों की मांग में कोई कमी नहीं आई है।

बदलाव का इंतजार कोसी के इन गांवों में सड़क, पुल और नियमित सरकारी नाव सेवा की मांग बरसों से हो रही है, लेकिन हालात नहीं बदले। यहां के लोग अब सरकार के भरोसे बैठने के बजाय अपनी मेहनत से खुद अपनी जीवन रेखा तैयार कर रहे हैं। मानसून के ये चार महीने उनके लिए केवल मौसम नहीं, बल्कि अस्तित्व बचाने की एक बड़ी चुनौती होते हैं।

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