UN में शांति का ढोल या सुपारी का खेल? भारत के खिलाफ एजेंडा चलाने वाले अधिकारी का पर्दाफाश
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संयुक्त राष्ट्र (UN) जैसी वैश्विक संस्था, जिस पर दुनिया में शांति बनाए रखने की जिम्मेदारी है, अब गंभीर आरोपों के घेरे में है। यूएन वॉच की एक 104 पन्नों की रिपोर्ट ने वैश्विक स्तर पर हड़कंप मचा दिया है। इसमें दावा किया गया है कि UN के कई अधिकारी रिश्वत लेकर भारत के खिलाफ एजेंडा चला रहे हैं।

कौन हैं प्रोफेसर बेन सॉल और क्या हैं आरोप?

प्रोफेसर बेन सॉल यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी में इंटरनेशनल लॉ के प्रोफेसर हैं और 2023 में उन्हें संयुक्त राष्ट्र का मानवाधिकार और आतंकवाद-विरोधी विशेष दूत नियुक्त किया गया था। उन पर आरोप है कि उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग किया और चीन से डेढ़ लाख डॉलर की रिश्वत ली।

चीनी डॉलर और चुप्पी का कनेक्शन

रिपोर्ट के मुताबिक, बेन सॉल का काम चीन में उइगर मुसलमानों के खिलाफ हो रहे अत्याचारों को बेनकाब करना था। लेकिन चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से पैसे लेने के बाद, उन्होंने उइगरों के मुद्दे पर पूरी तरह चुप्पी साध ली। न कोई रिपोर्ट आई, न कोई बयान। चीन ने अपने जुल्मों को छिपाने के लिए UN के इस अधिकारी को खरीद लिया था।

भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा की साजिश

चीन के पैसे का असर यह हुआ कि बेन सॉल ने उइगरों के मुद्दे को तो नजरअंदाज कर दिया, लेकिन भारत को निशाना बनाना शुरू कर दिया। जब 2025 में पहलगाम आतंकी हमला हुआ, तो आतंकी गतिविधियों की निंदा करने के बजाय उन्होंने भारत को ही संयम बरतने की नसीहत दे डाली।

आतंकवाद के खिलाफ भारत की मुहिम पर सवाल

बेन सॉल और उनके सहयोगियों ने भारत द्वारा आतंकवाद के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों को भेदभावपूर्ण करार दिया। कश्मीर में आतंकियों के मददगारों और अवैध अतिक्रमणकारियों पर हुई कार्रवाई को उन्होंने मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया। दिलचस्प बात यह है कि वही व्यक्ति, जिसे चीन के अत्याचार नहीं दिखे, उसे भारत की हर कार्रवाई में निशाना बनाने की साजिश नजर आने लगी।

क्या UN अब साख खो चुका है?

यूएन वॉच की रिपोर्ट बताती है कि संयुक्त राष्ट्र में ऐसे 59 विशेष प्रतिनिधि हैं, जिनकी कार्यप्रणाली संदेह के दायरे में है। स्पष्ट है कि ये अधिकारी शांति के दूत न होकर, सुपारी लेकर प्रोपेगेंडा फैलाने वाले एजेंडाबाज बन चुके हैं।

भारत विरोधी नैरेटिव और बार-बार कश्मीर, CAA या मणिपुर जैसे मुद्दों पर UN की पक्षपाती रिपोर्ट इसी भ्रष्ट तंत्र का परिणाम है। अब सवाल यह उठने लगा है कि क्या ऐसी संस्था की विश्वसनीयता खत्म हो चुकी है, जिस पर रिश्वतखोरी के इतने गंभीर आरोप लगे हों?

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