मैहर बैंड को राष्ट्रीय गौरव: 108 साल पुरानी संगीत परंपरा अब आधिकारिक अमूर्त सांस्कृतिक विरासत
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मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक आभा को अंतरराष्ट्रीय पटल पर एक और नई चमक मिली है। सतना जिले की मां शारदा की नगरी मैहर का विश्वविख्यात मैहर बैंड (मैहर वाद्यवृंद) अब भारत सरकार की राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (Intangible Cultural Heritage) सूची में शामिल हो गया है। यह सम्मान इस बैंड की सदियों पुरानी समृद्ध परंपरा और संगीत के प्रति इसके अद्वितीय योगदान की राष्ट्रीय स्वीकृति है।

संगीत की एक अनोखी विरासत मैहर बैंड केवल एक ऑर्केस्ट्रा नहीं, बल्कि भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक जीवंत परंपरा है। इसकी शुरुआत 1918 में महान संगीताचार्य उस्ताद अलाउद्दीन खां ने मैहर के तत्कालीन महाराजा बृजनाथ सिंह जूदेव के सहयोग से की थी। इसे दुनिया के शुरुआती शास्त्रीय ऑर्केस्ट्रा स्वरूपों में से एक माना जाता है, जो आज भी अपनी मूल गरिमा के साथ कायम है।

बंदूक की नाल से निकले सुर इस बैंड की सबसे बड़ी विशेषता इसके दुर्लभ वाद्ययंत्र और उनका संयोजन है। इसमें सितार, सरोद, इसराज और वायलिन जैसे वाद्यों का मेल है, लेकिन नालतरंग इसे विश्व में अद्वितीय बनाता है। उस्ताद अलाउद्दीन खां ने मैहर रियासत की पुरानी और टूटी हुई बंदूकों की नलियों को स्वरबद्ध कर इस खास वाद्ययंत्र का निर्माण किया था। ऐसा वाद्य पूरे विश्व में कहीं और नहीं पाया जाता।

गुरु-शिष्य परंपरा का अटूट बंधन पिछले 108 वर्षों से मैहर बैंड ने अपनी मौलिकता को संजोकर रखा है। इसकी सबसे बड़ी शक्ति गुरु-शिष्य परंपरा है, जिसके माध्यम से यह विरासत पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित हो रही है। 1924 के भातखंडे समारोह से मिली ख्याति से लेकर 2016 के शिखर सम्मान तक, इस बैंड ने भारतीय संगीत जगत में अपनी धाक जमाई रखी है।

भविष्य के लिए विशेष तैयारी इस उपलब्धि के बाद मध्यप्रदेश का संस्कृति विभाग अब और भी सक्रिय हो गया है। मैहर बैंड की शैली को विलुप्त होने से बचाने के लिए शासकीय संगीत महाविद्यालय, मैहर में एक गुरुकुल की स्थापना की जा रही है। यहाँ युवा कलाकार इस ऐतिहासिक वादन शैली का विधिवत प्रशिक्षण प्राप्त करेंगे, ताकि यह सांस्कृतिक धरोहर आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुँच सके।

बढ़ती वैश्विक पहचान इससे पहले मध्यप्रदेश की गोंड चित्रकला और भगोरिया नृत्य को भी इस प्रतिष्ठित सूची में स्थान मिल चुका है। अब मैहर बैंड के शामिल होने से राज्य की सांस्कृतिक पहचान और अधिक सशक्त हुई है। सरकार का यह प्रयास न केवल कला को संरक्षण दे रहा है, बल्कि युवाओं को अपनी जड़ों और शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा से जोड़ने का सेतु भी बन रहा है।

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