क्या पूर्वांचल में शुरू हो गया बड़ा ब्राह्मण गेम ? भरत तिवारी एनकाउंटर पर गरमाई यूपी की सियासत
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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में अभी वक्त है, लेकिन सियासी बिसात अभी से बिछने लगी है। बिहार के बक्सर में हुए भरत तिवारी एनकाउंटर की आग अब यूपी तक पहुंच गई है। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय का अचानक पीड़ित परिवार के घर पहुंचना महज संवेदना नहीं, बल्कि एक गहरी चुनावी रणनीति की ओर इशारा कर रहा है।

एनकाउंटर या टारगेट किलिंग ? बिहार के भोजपुर में पुलिस ने भरत तिवारी को मुठभेड़ में ढेर कर दिया था। पुलिस का दावा है कि तिवारी वांछित था और उसने फायरिंग की। लेकिन एनकाउंटर का वीडियो सामने आने के बाद स्थानीय लोगों और मानवाधिकार संगठनों ने इसे फर्जी और टारगेट किलिंग करार दिया है। बढ़ते सियासी दबाव के चलते पुलिस को बैकफुट पर आना पड़ा है और संबंधित पुलिसकर्मियों पर एफआईआर भी दर्ज करनी पड़ी है।

यूपी की सियासत में हलचल क्यों? भरत तिवारी का कनेक्शन और ब्राह्मण समाज का प्रभाव उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती पूर्वांचल जिलों जैसे बलिया, गाजीपुर और चंदौली में गहरा है। विपक्ष इसे विकास दुबे मामले की तरह ब्राह्मणों पर अत्याचार के नैरेटिव के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। अजय राय, जो खुद भूमिहार ब्राह्मण समाज के बड़े चेहरे हैं, उनका यह दौरा कांग्रेस की खोई हुई जमीन वापस पाने की कोशिश माना जा रहा है।

सड़क से संसद तक न्याय की लड़ाई पीड़ित परिवार से मुलाकात के बाद अजय राय ने तीखे तेवर अपनाए। उन्होंने कहा, यह एनकाउंटर नहीं, सीधी हत्या है। जब पुलिस ही जज और जल्लाद बन जाएगी, तो अदालतों का क्या काम? कांग्रेस इस मामले को सड़क से लेकर सदन तक उठाएगी। किसी विशेष जाति को निशाना बनाने की नीति अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

2027 के लिए ब्राह्मण कार्ड का इस्तेमाल? राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, सपा-कांग्रेस गठबंधन अब गैर-यादव ओबीसी के साथ-साथ नाराज सवर्णों, विशेषकर ब्राह्मणों को साधने की रणनीति पर काम कर रहा है। पूर्वांचल की करीब 100 से अधिक सीटों पर ब्राह्मण और सवर्ण मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं।

बिहार का यह एनकाउंटर यूपी के विपक्ष को एक ऐसा मुद्दा दे गया है, जिससे वे न केवल प्रदेश की एनकाउंटर नीति पर सवाल उठा सकते हैं, बल्कि ब्राह्मण समाज की सहानुभूति भी बटोर सकते हैं। अजय राय का यह कदम स्पष्ट संकेत है कि 2027 के चुनाव में फर्जी एनकाउंटर और जातीय उपेक्षा सबसे बड़े चुनावी मुद्दे बनेंगे।

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