आज सुबह मेट्रो में दो लड़कों की बातचीत ने स्पोर्ट्स मार्केट की एक कड़वी हकीकत सामने रख दी। एक लड़का फीफा वर्ल्ड कप 2026 के मैचों और मेसी की तकनीक पर चर्चा कर रहा था, तो दूसरा बस बेबसी से मुस्कुरा दिया। उसका कहना था, यार, मैं वर्ल्ड कप देख ही नहीं पा रहा, सब्सक्रिप्शन प्लान बजट से बाहर है। यह सिर्फ दो दोस्तों की बात नहीं है, बल्कि देश के लाखों मिडिल क्लास फैंस की कहानी है।
फ्री के दौर का अंत: कॉरपोरेट का नया बिसात भारत में पिछले कुछ सालों में जियो-सिनेमा और हॉटस्टार के कारण फैंस को स्मार्टफोन पर सब कुछ फ्री देखने की आदत पड़ गई थी। अब Zee Entertainment ने फीफा के साथ 2026 से 2034 तक के लिए एक बड़ी डील साइन की है। एक्सपर्ट्स इसे 40 मिलियन डॉलर का जुआ कह रहे हैं। कंपनी ने डिजिटल राइट्स तो ले लिए, लेकिन आम दर्शकों के लिए पे-वॉल खड़ा कर दिया है। यह कॉरपोरेट के लिए शायद गणित का सही खेल हो, लेकिन फैंस के लिए बड़ा झटका है।
अधूरी तैयारी, आखिरी समय की डील भारत में फुटबॉल का क्रेज वर्ल्ड कप के दौरान ही उफान पर होता है। टूर्नामेंट शुरू होने के कुछ दिन पहले तक स्थिति स्पष्ट नहीं थी। आखिरी समय में हुई इस डील ने रिसर्च की कमी को साफ कर दिया है। महानगरों के रईस फैंस पर इसका असर शायद कम हो, लेकिन देश के उस फुटबॉल कल्चर पर इसका गहरा प्रहार होगा जो अभी अंकुरित ही हो रहा है।
छोटे शहरों के अनदेखे सपने केरल के गांव हों या यूपी-बिहार के मिट्टी के मैदान, वहां का युवा मेसी और रोनाल्डो को देखकर बड़े सपने बुनता है। अब ₹1699 का सालाना प्लान उन तक फुटबॉल की पहुंच को एलीट (अमीर वर्ग) का शौक बना रहा है। जो युवा ₹200 के डेटा रिचार्ज पर निर्भर है, वह खेल की दुनिया का हिस्सा कैसे बनेगा? जब तक खेल केवल प्रीमियम पैकेज के पीछे लॉक रहेगा, जमीनी स्तर की प्रतिभाएं दम तोड़ती रहेंगी।
सरकारी ब्रॉडकास्टिंग की बेबसी मौजूदा स्पोर्ट्स ब्रॉडकास्टिंग गाइडलाइंस के तहत दूरदर्शन (DD Sports) पूरा टूर्नामेंट नहीं दिखा सकता। यह केवल कुछ चुनिंदा मैच ही फ्री दिखा पाएगा। लेकिन क्या किसी युवा को प्रेरणा सिर्फ नॉकआउट मैचों से मिलती है? ग्रुप स्टेज के संघर्ष और छोटी टीमों के उलटफेर ही खेल की समझ विकसित करते हैं। इस चेन के टूटने से फुटबॉल की नई पीढ़ी को भारी नुकसान होगा।
बदलाव की ज़रूरत: खेल को मुनाफे की बेड़ियों से आज़ाद करें भारत खुद को मल्टी-स्पोर्ट्स नेशन कहता है, लेकिन खेल कोई लग्जरी प्रोडक्ट नहीं है। यदि सरकार वाकई स्पोर्ट्स कल्चर विकसित करना चाहती है, तो स्पोर्ट्स ब्रॉडकास्टिंग सिग्नल्स अधिनियम में बदलाव जरूरी है। इस कानून के दायरे को अब केवल टीवी तक नहीं, बल्कि डिजिटल और OTT प्लेटफॉर्म्स तक भी बढ़ाना होगा।
जब तक राष्ट्रीय महत्व के ग्लोबल इवेंट्स डिजिटल रूप से फ्री-टू-एयर नहीं होंगे, तब तक भारत न तो मैदान पर वर्ल्ड कप खेल पाएगा और न ही स्क्रीन के सामने बैठा दर्शक खेल का असली आनंद ले पाएगा। यह समय है कि खेल को मुनाफे के गणित से बाहर निकालकर जुनून के हवाले किया जाए।
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— ZEE (@ZEECorporate) June 10, 2026
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