कचरे के ढेरों से मुक्ति? दिल्ली में अब हर तरफ दिखेंगी जीरो-वेस्ट कॉलोनी , जानें क्या है एलजी का मास्टर प्लान
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दिल्ली में हर दिन पैदा होने वाले 11,862 टन कचरे से निपटने के लिए प्रशासन ने अब कमर कस ली है। कचरे के निस्तारण के लिए अब जीरो-वेस्ट कॉलोनी मॉडल को पूरी राजधानी में लागू करने की तैयारी है। दिल्ली के उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू ने इस दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए नगर निगम (MCD) को निर्देश दिए हैं कि शहर में ऐसी 100 और कॉलोनियां बनाई जाएं।

क्या होती है जीरो-वेस्ट कॉलोनी ? जीरो-वेस्ट का मतलब है—वह स्थान जहां से कचरा बाहर न निकले। ऐसी कॉलोनियों में कचरे को घर से निकलते ही गीले, सूखे, सैनिटरी और ई-वेस्ट में बांट दिया जाता है। गीले कचरे से कॉलोनी के अंदर ही खाद बनाई जाती है, जबकि सूखे कचरे को रिसायकल के लिए भेज दिया जाता है। इस तरह लैंडफिल साइट तक कचरा लगभग न के बराबर पहुंचता है।

नवजीवन विहार बना मिसाल एलजी संधू ने हाल ही में नवजीवन विहार कॉलोनी का दौरा किया, जो पिछले 8 सालों से इस मॉडल पर काम कर रही है। यहां की सक्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस कॉलोनी ने अब तक 10 लाख किलो से ज्यादा कचरे को लैंडफिल साइट्स तक जाने से रोका है। एलजी ने यहां के RRR (रिड्यूस-रीयूज-रिसाइकल) सेंटर और रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम की सराहना की।

CSR और MCD का सहयोग एलजी ने निर्देश दिए हैं कि छोटी और अनधिकृत कॉलोनियों में जीरो-वेस्ट प्रोजेक्ट्स को बढ़ावा देने के लिए कॉर्पोरेट घरानों की मदद (CSR फंडिंग) ली जाए। इससे छोटे इलाकों में कम्पोस्टिंग यूनिट और जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना आसान होगा। दिल्ली का लक्ष्य है कि भविष्य में अस्पतालों के कचरे को भी उनके कैंपस के भीतर ही प्रोसेस किया जाए।

कैसे मिलेगी प्रेरणा? (प्रोत्साहन राशि) सिर्फ नियम ही नहीं, निगम ने कॉलोनियों को प्रोत्साहित करने के लिए सहभागिता स्कीम भी शुरू की है। जो रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) कचरे का शत-प्रतिशत सोर्स पर ही निस्तारण करती हैं, उन्हें जमा प्रॉपर्टी टैक्स का 10% हिस्सा विकास कार्यों के लिए वापस मिलता है। शत-प्रतिशत कचरा अलग करने पर 5% अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि भी दी जाती है।

बड़ा बदलाव जरूरी क्यों? वर्तमान में दिल्ली में पैदा होने वाले कचरे का केवल 63% ही प्रोसेस हो पा रहा है। बाकी का कूड़ा या तो सड़कों पर बिखरा रहता है या लैंडफिल साइट्स (गाजीपुर, ओखला, भलस्वा) के पहाड़ों को और बड़ा कर देता है। यदि ये 100 नई कॉलोनियां सफल रहीं, तो राजधानी में कचरे के प्रबंधन का चेहरा पूरी तरह बदल सकता है।

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