महरंग बलोच: बलूच शेरनी को उम्रकैद, पिता की हत्या और भाई की गुमशुदगी जिसने बना दिया विद्रोही
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बलूचिस्तान की निर्भीक आवाज और मानवाधिकार कार्यकर्ता महरंग बलोच को क्वेटा की आतंकवाद-रोधी अदालत (ATC) ने उम्रकैद की सजा सुनाई है। यह फैसला जुलाई 2024 में ग्वादर में हुए बलोच रजी माची आंदोलन के दौरान एक सुरक्षा अधिकारी की कथित हत्या के मामले में आया है। इस फैसले ने पाकिस्तान के भीतर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल मचा दी है।

कौन हैं महरंग बलोच? 33 वर्षीय महरंग पेशे से एक डॉक्टर हैं, लेकिन बलूचिस्तान में उन्हें बलोच की शेरनी के रूप में जाना जाता है। उन्होंने अपना जीवन बलूच समुदाय पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ समर्पित कर दिया है। उन्होंने कभी शादी न करने का फैसला किया ताकि पूरी तरह से अपने संघर्ष पर ध्यान केंद्रित कर सकें।

दर्दनाक अतीत ने बनाया निडर योद्धा महरंग का संघर्ष व्यक्तिगत त्रासदी से उपजा है। वर्ष 2009 में उनके पिता, जो एक मजदूर नेता थे, को पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने अगवा कर लिया था। दो साल के अमानवीय यातना के बाद 2011 में उनकी लाश मिली। इसके बाद 2017 में उनके भाई को भी अगवा कर लिया गया। इन घटनाओं ने महरंग को सरकारी दमन के खिलाफ एक कट्टर आंदोलनकारी बना दिया।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान महरंग का प्रभाव सिर्फ बलूचिस्तान तक सीमित नहीं है। दिसंबर 2023 में लापता बलूच लोगों के लिए उन्होंने तुर्बत से इस्लामाबाद तक 1600 किलोमीटर लंबी पदयात्रा का नेतृत्व किया। उनके इस साहसी कदम के कारण उन्हें BBC की 100 प्रभावशाली महिलाओं और TIME100 Next 2024 की सूची में शामिल किया गया।

क्या है सजा का आधार? अदालत का यह फैसला जुलाई 2024 में ग्वादर में हुए शांतिपूर्ण आंदोलन बलोच रजी माची से जुड़ा है। जब यह प्रदर्शन जन-आंदोलन बना, तो सुरक्षा बलों ने इसे कुचलने की कोशिश की, जिससे हिंसा भड़क गई। इस दौरान एक सुरक्षा अधिकारी की मौत का आरोप महरंग बलोच और उनके सहयोगियों पर मढ़ दिया गया, जिसके बाद उन पर आतंकवाद का मुकदमा चला।

न्यायिक आतंकवाद या दमन की राजनीति? महरंग बलोच और उनके साथियों ने इस पूरी अदालती कार्यवाही का बहिष्कार किया था और वे जेल में धरने पर थे। फैसले के बाद बलूच यकजहती कमेटी (BYC) ने इसे न्यायिक आतंकवाद करार दिया है। मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि यह सजा कानूनी कम और राजनीतिक प्रतिशोध ज्यादा है, जिसका उद्देश्य बलूच आंदोलन की कमर तोड़ना है।

इस घटना ने एक बार फिर बलूचिस्तान में मानवाधिकारों की स्थिति और पाकिस्तानी सरकारी तंत्र के कामकाज पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।

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