आज के दौर में जब मोबाइल की एक क्लिक पर हजारों गाने और फिल्में उपलब्ध हैं, तब यह कल्पना करना मुश्किल है कि एक समय पूरा देश सिर्फ 30 मिनट के एक कार्यक्रम के लिए ठहर जाता था। वह दौर रामायण और महाभारत के प्रसारण से भी पहले का है और उस शो का नाम था— चित्रहार ।
गलियां हो जाती थीं सूनी 1980 के दशक में जब चित्रहार शुरू होता था, तो गांव की चौपाल से लेकर शहरों की गलियों तक सन्नाटा पसर जाता था। लोग अपने दिनभर के काम निपटाकर टीवी के सामने जम जाते थे। उस समय न तो मल्टी-चैनल वाला केबल टीवी था और न ही इंटरनेट। पूरे हफ्ते लोग सिर्फ इस बात का इंतजार करते थे कि कब चित्रहार शुरू होगा।
15 करोड़ दर्शकों का जुनून चित्रहार दूरदर्शन का एक ऐसा फिल्मी गीतों वाला शो था, जिसने लोकप्रियता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे। इसकी दीवानगी का आलम यह था कि उस समय इसके दर्शकों की संख्या करीब 15 करोड़ तक पहुंच गई थी। गाने कौन से आएंगे, यह जानने के लिए लोगों में जो सस्पेंस और एक्साइटमेंट होता था, वह आज के दौर में शायद ही कहीं देखने को मिलता है।
साक्षरता में भी निभाई भूमिका इस शो की लोकप्रियता का लाभ उठाते हुए अगस्त 2002 में भारत सरकार ने इसमें सेम लैंग्वेज सबटाइटलिंग (SLS) की सुविधा शुरू की। इस पहल का उद्देश्य लोगों की पढ़ने की क्षमता और गति को सुधारना था। रिपोर्ट्स के अनुसार, इसका फायदा देश के करीब 8 से 10 करोड़ लोगों को मिला था।
बढ़ती मांग, बढ़ता प्रसारण शुरुआत में चित्रहार हफ्ते में केवल एक दिन आता था, लेकिन दर्शकों की भारी मांग के कारण इसे हफ्ते में दो दिन (बुधवार और शुक्रवार) प्रसारित किया जाने लगा। इसी तर्ज पर रविवार को प्रसारित होने वाला रंगोली शो भी बेहद लोकप्रिय हुआ, जिसमें एंकर गानों के बारे में रोचक जानकारियां देती थीं।
आज भले ही हमारे पास मनोरंजन के असीमित विकल्प मौजूद हैं, लेकिन चित्रहार का वह दौर एक ऐसी याद है जिसे आज की पीढ़ी शायद ही कभी महसूस कर पाए। वह दौर वाकई में सुकून और सादगी का था।
इन आँखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारों हैं
— Doordarshan National दूरदर्शन नेशनल (@DDNational) May 16, 2019
इन आँखों से वाबस्ता अफ़साने हज़ारों हैं...
Musician #Khayyam special #Chitrahaar - Friday at 10 pm and Monday morning at 9:30 am on @DDNational pic.twitter.com/Gf7bFVCfIv
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