अमेरिका के साथ वार्ता से पहले ईरान ने दी कूटनीतिक चुनौती, मिनाब के शहीदों को याद कर घेरा
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अमेरिका और ईरान के बीच स्विट्जरलैंड में होने वाली अहम बातचीत से पहले ईरान ने एक बड़ा कूटनीतिक दांव चला है। ईरानी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे संसद स्पीकर मोहम्मद बागेर गालिबाफ ने वार्ता की मेज पर बैठने से पहले मिनाब स्कूल हादसे के पीड़ितों को याद कर अमेरिका को बैकफुट पर धकेल दिया है।

गालिबाफ का भावुक संदेश

स्विट्जरलैंड रवाना होने से पहले गालिबाफ ने X पर अपने प्लेन के सामने एक तस्वीर साझा की। इस पर #Minab168 हैशटैग लिखा था। गालिबाफ ने लिखा कि वे मिनाब के उन मासूम बच्चों और ईरान के शहीदों को हर पल अपने साथ महसूस करते हैं। उन्होंने साफ किया कि वे इस बातचीत में किसी भी हाल में उन शहीदों को शर्मिंदा नहीं होने देंगे।

क्या है 14 सूत्रीय समझौता?

यह वार्ता पश्चिम एशिया में जारी तनाव को कम करने के लिए बनी 14 सूत्रीय रूपरेखा को लागू करने का हिस्सा है। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा कि ईरान किसी भी समझौते पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं करेगा। उन्होंने पुराने अनुभवों का हवाला देते हुए कहा कि अमेरिका की पिछली वादाखिलाफी को देखते हुए इस बार ईरान हर कदम फूंक-फूंक कर रखेगा।

कौन शामिल है ईरानी टीम में?

ज्यूरिख पहुंचे ईरानी दल में देश के कद्दावर चेहरे शामिल हैं। इसमें विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची, केंद्रीय बैंक के गवर्नर अब्दोलनासेर हेममती और नेशनल ईरानी ऑयल कंपनी के चेयरमैन हमीद बोर्दे के अलावा कई प्रमुख रणनीतिकार शामिल हैं। यह टीम समझौते की शर्तों की बारीकी से समीक्षा करेगी।

मिनाब हादसा: एक गहरा घाव

फरवरी 2026 में होर्मोज़गान प्रांत के मिनाब शहर में एक प्राथमिक स्कूल पर मिसाइल हमला हुआ था, जिसमें 168 लोगों की मौत हो गई थी। ईरान इसे एक बड़ी मानवीय त्रासदी मानता है, जबकि अमेरिका और इजराइल ने इसे सैन्य लक्ष्य के पास होने के कारण हुई गलती बताया था। ईरान ने पहले इस्लामाबाद वार्ता के दौरान भी विमान में बच्चों की तस्वीरें और उनके खून से सने बैग रखकर अपनी नाराजगी जाहिर की थी।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर कूटनीतिक दबाव

स्विट्जरलैंड के विदेश मंत्रालय ने ईरानी प्रतिनिधिमंडल का स्वागत किया है, लेकिन ईरान का यह कड़ा रुख स्पष्ट करता है कि बातचीत आसान नहीं होगी। गालिबाफ का यह कदम न केवल उनके देश की जनता को एक संदेश है, बल्कि वैश्विक मंच पर अमेरिका के लिए एक ऐसी चुनौती है, जिससे बचना आसान नहीं होगा।

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