यूपी: संत कबीर नगर में दलित युवक की निर्मम हत्या, भीम-मीम नैरेटिव पर उठे सवाल
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उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर से एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है। यहाँ नासिर अली नामक युवक ने आनंद नाम के एक दलित युवक का सरेआम गला रेतकर कत्ल कर दिया। इस बर्बरता के बाद पूरे इलाके में तनाव का माहौल है और ग्रामीण आरोपियों की तुरंत गिरफ्तारी व एनकाउंटर की मांग कर रहे हैं।

क्या है पूरा मामला?

मृतक आनंद ने हाल ही में अपनी भांजी के साथ छेड़छाड़ करने पर नासिर अली को करारा थप्पड़ जड़ा था। यही बात नासिर को नागवार गुजरी। गुरुवार को जब आनंद बाजार से घर लौट रहा था, तब नासिर ने अपने साथियों के साथ मिलकर उसे घेर लिया। इसके बाद धारदार हथियार से गला रेतकर उसकी हत्या कर दी गई। पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है और आरोपितों की धरपकड़ के लिए बड़े पैमाने पर सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है।

भीम-मीम एकता पर लगी चुप्पी

इस घटना ने दलितों और मुस्लिमों के बीच भीम-मीम एकता का दावा करने वाले राजनीतिक दलों के दोहरेपन को उजागर कर दिया है। दलितों के वोट पर अपनी राजनीति चमकाने वाले दल इस मामले पर पूरी तरह खामोश हैं। आलोचकों का कहना है कि जब आरोपी किसी खास समुदाय (मुस्लिम) का होता है, तो कथित दलित मसीहा और राजनीतिक दल सांप सूंघने जैसी स्थिति में क्यों आ जाते हैं?

आंकड़ों में दलित उत्पीड़न की कड़वी सच्चाई

यह पहली बार नहीं है जब दलितों पर अत्याचार हुआ हो। रिपोर्ट्स के अनुसार, जनवरी से अप्रैल 2026 के बीच ही एससी/एसटी एक्ट के तहत मुस्लिमों के खिलाफ दलित उत्पीड़न के 1,983 मामले दर्ज किए गए हैं। यह आंकड़े उन दावों की पोल खोलते हैं, जिनमें दलितों और मुस्लिमों के बीच सामाजिक सामंजस्य की बात कही जाती है।

सपा का PDA नैरेटिव और पुराना इतिहास

समाजवादी पार्टी अपने PDA (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) नारे के जरिए जनता को लुभाने की कोशिश कर रही है। हालांकि, एनसीआरबी (NCRB) के आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव के शासनकाल में दलितों पर अत्याचार के मामलों में भारी बढ़ोतरी देखी गई थी।

2012 से 2017 के बीच यूपी में दलितों के विरुद्ध अपराध के 15,000 से अधिक मामले दर्ज हुए। वर्ष 2016-17 में तो उत्तर प्रदेश दलितों के खिलाफ अपराधों के मामले में देश में शीर्ष पर था। बदायूं कांड जैसा कुख्यात मामला भी सपा सरकार की कानून व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न रहा है।

सुविधा की राजनीति का खेल

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दलित उत्पीड़न अगर किसी खास राजनीतिक नैरेटिव में फिट बैठता है, तो पार्टियां शोर मचाती हैं, लेकिन यदि आरोपित मुस्लिम समुदाय से हो, तो वही राजनीतिक ऊर्जा गायब हो जाती है। यह घटना स्पष्ट करती है कि भीम-मीम की राजनीति सिद्धांतों पर नहीं, बल्कि केवल वोट बैंक की सुविधा पर आधारित है।

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