हिंदुओं को जातियों में बांटने का विभाजनकारी एजेंडा : क्या मौलाना नोमानी अपनी जमात की आंतरिक कुरीतियों पर भी बोलेंगे?
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हाल ही में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मौलाना सज्जाद नोमानी का एक बयान सामने आया है, जिसने समाज में एक नई बहस छेड़ दी है। मौलाना नोमानी का दावा है कि भारत में अब हिंदू बहुसंख्यक नहीं, बल्कि अल्पसंख्यक हैं। उन्होंने अपने कथित 25 साल के शोध का हवाला देते हुए हिंदुओं को जाति, समुदाय और क्षेत्र के आधार पर खंडित करने का प्रयास किया है।

साजिश: जातियों के नाम पर सनातन को तोड़ने का प्रयास मौलाना नोमानी ने एक विवादास्पद बयान में दलित, आदिवासी, लिंगायत और यहां तक कि तमिलनाडु की पूरी आबादी और जाट समुदाय को हिंदू मानने से ही इनकार कर दिया है। सवाल यह है कि जो समाज हजारों वर्षों से एक साझा संस्कृति और आस्था से जुड़ा है, उसे अचानक अलग कैसे बताया जा सकता है? यह स्पष्ट रूप से सनातन संस्कृति को कमजोर करने की एक सोची-समझी वैचारिक रणनीति प्रतीत होती है।

संविधान और इतिहास की कसौटी पर मौलाना के दावे फेल मौलाना का यह दावा कि अनुसूचित जाति के लोग हिंदू नहीं हैं, न केवल ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत है, बल्कि संवैधानिक रूप से भी गलत है। भारत का संविधान स्पष्ट करता है कि अनुसूचित जाति का दर्जा उन्हीं को मिलता है जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म से जुड़े हों। महर्षि वाल्मीकि से लेकर भक्ति आंदोलन के तमाम संतों तक, दलित समुदाय सदैव सनातन धर्म का आधार स्तंभ रहा है।

इसी तरह, लिंगायत समुदाय को जो निराकार शिव की उपासना करता है, उसे हिंदू धर्म से अलग करना हास्यास्पद है। 1872 की पहली जनगणना से लेकर आज तक लिंगायतों को हमेशा हिंदू संप्रदाय का हिस्सा माना गया है। तमिलनाडु, जिसे भारत में मंदिरों का गढ़ कहा जाता है—जहाँ 39,000 से अधिक मंदिर हैं—उसे गैर-हिंदू बताना अज्ञानता की पराकाष्ठा है।

मुस्लिम समाज की जातियों पर मौलाना चुप्पी क्यों साधे हुए हैं? मौलाना नोमानी की दोहरी नीति तब साफ नजर आती है जब वे शिया-सुन्नी या अशराफ-अजलाफ-अरजाल के बीच बंटे मुस्लिम समाज के वर्गीकरण पर चुप्पी साधे रखते हैं। भारतीय मुस्लिम समाज में भी लगभग 100 से अधिक जातियां और सामाजिक समूह मौजूद हैं, जहाँ सामाजिक भेदभाव का लंबा इतिहास रहा है।

अशराफ (उच्च वर्गीय मुस्लिम) और अजलाफ/अरजाल (पिछड़े वर्ग के मुस्लिम) के बीच का अंतर जगजाहिर है। यदि मौलाना नोमानी हिंदुओं के कथित बंटवारे को मुद्दा बना सकते हैं, तो क्या वे अपने ही समुदाय के भीतर मौजूद इस जातिगत पदानुक्रम और भेदभाव पर कोई शोध पेश करेंगे? क्या वे अशराफ और अजलाफ के बीच व्याप्त असमानताओं पर भी इसी तल्खी के साथ बोलेंगे?

क्या यह हिंदूफोबिया का एक नया रूप है? मौलाना नोमानी का यह एजेंडा केवल हिंदुओं को बांटने तक सीमित नहीं है। वे हिंदुओं को सेक्युलर और फासीवादी के खांचे में बांटकर एक वैचारिक युद्ध भी छेड़ रहे हैं। यह वही कुंठा क्लब की मानसिकता है जो अक्सर हिंदू विरोधी अभियानों को कल्पना मानकर खारिज कर देती है, लेकिन जब बात सनातन धर्म को तोड़ने की आती है, तो उनके एजेंडे का समर्थन करती है।

मौलाना नोमानी का यह बयान केवल एक व्यक्तिगत राय नहीं, बल्कि एक सुनियोजित साजिश है जिसका उद्देश्य भारत के बहुसंख्यक समाज को मानसिक रूप से विभाजित करना है। समय आ गया है कि ऐसी विभाजनकारी सोच का वैचारिक और तथ्यों के साथ पुरजोर खंडन किया जाए।

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