कच्चा तेल 80 डॉलर के पार, फिर भी जेब क्यों ढीली? पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर छिड़ा सियासी संग्राम
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अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में नरमी के बावजूद देश में पेट्रोल-डीजल के दाम कम नहीं हो रहे हैं। ब्रेंट क्रूड की कीमत 80 डॉलर प्रति बैरल के नीचे आने के बाद भी खुदरा कीमतों में कोई बदलाव न होने से आम जनता का गुस्सा बढ़ गया है।

कांग्रेस का सरकार पर तीखा हमला विपक्ष ने केंद्र सरकार को घेरा है। केरल कांग्रेस का आरोप है कि तेल कंपनियां रोजाना 2,000 करोड़ रुपये का मुनाफा कमा रही हैं, इसलिए वे कीमतें कम नहीं करना चाहतीं। विपक्ष का तर्क है कि जब कच्चा तेल महंगा होता है, तो बोझ तुरंत जनता पर डाल दिया जाता है, लेकिन सस्ता होने पर राहत क्यों नहीं दी जाती?

तहसीन पूनावाला का तंज राजनीतिक विश्लेषक तहसीन पूनावाला ने सोशल मीडिया पर सवाल उठाया कि जब कच्चा तेल 79.33 डॉलर प्रति बैरल पर है, तब भी भारतीय उपभोक्ता भारी कीमत चुका रहे हैं। उन्होंने कहा, हमें अच्छे दिनों का वादा किया गया था, लेकिन जनता को बार-बार वैश्विक संकट का हवाला देकर महंगे ईंधन का बोझ उठाने को कहा जा रहा है।

तेल कंपनियों की अपनी मजबूरी इस बीच, सरकार और तेल कंपनियों ने अपना पक्ष रखा है। विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ कच्चे तेल का दाम कम होना काफी नहीं है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण शिपिंग लागत, बीमा और तेल को भारत तक लाने का किराया अभी भी काफी अधिक है। इन खर्चों के कारण तेल कंपनियां कीमतें घटाने में हिचकिचा रही हैं।

मंत्रालय का क्या है कहना? पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने स्पष्ट किया है कि सरकार स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए है। उन्होंने कहा कि रिफाइनरियां अपनी पूरी क्षमता से काम कर रही हैं और देश में ईंधन की आपूर्ति स्थिर है। उन्होंने संकेत दिया कि वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए ही कीमतों पर आगे कोई फैसला लिया जाएगा।

राजनीतिक रूप से क्यों है अहम? मई महीने में चुनाव के तुरंत बाद पेट्रोल-डीजल के दामों में चार बार बढ़ोतरी की गई थी। इसके बाद से कीमतें स्थिर बनी हुई हैं। बढ़ती महंगाई और परिवहन लागत का सीधा असर आम लोगों के बजट पर पड़ रहा है। जानकारों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में नरमी का लाभ ग्राहकों को नहीं मिला, तो यह मुद्दा आने वाले समय में एक बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा कर सकता है।

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