ममता बनर्जी के पास अभी भी बचा है ये तुरुप का इक्का , क्या बगावत को कुचलकर पलट देंगी बाजी?
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पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) इन दिनों भारी संकट के दौर से गुजर रही है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (LoP) को लेकर छिड़ा विवाद अब ममता बनर्जी की पार्टी के लिए अस्तित्व की लड़ाई बनता जा रहा है। हाल ही में कलकत्ता हाई कोर्ट ने ममता बनर्जी को एक बड़ा झटका देते हुए विधानसभा स्पीकर के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है।

क्या है पूरा विवाद?

ममता बनर्जी ने स्पीकर के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें तृणमूल से निष्कासित बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दी गई है। ममता का तर्क है कि नेता प्रतिपक्ष चुनने का संवैधानिक अधिकार मूल राजनीतिक दल का होता है, न कि केवल विधायक दल का। फिलहाल, अगली सुनवाई तक ऋतब्रत बनर्जी ही इस पद पर बने रहेंगे।

पार्टी पर पकड़ ढीली होने का डर

अदालत के इस रुख ने ममता की राजनीतिक चुनौतियों को कई गुना बढ़ा दिया है। जानकार मानते हैं कि यह विवाद केवल एक पद के बारे में नहीं है, बल्कि यह टीएमसी की आंतरिक एकजुटता पर बड़ा सवालिया निशान है। बागी गुट का दावा है कि उन्हें विधायकों का बड़ा समर्थन हासिल है, जो सीधे तौर पर ममता के वर्चस्व को चुनौती दे रहा है।

ममता के सामने दोहरी चुनौती

फिलहाल ममता बनर्जी दो मोर्चों पर एक साथ लड़ रही हैं। पहला मोर्चा कानूनी है, जहां उनके पास अब भी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का विकल्प खुला है। दूसरा मोर्चा पूरी तरह राजनीतिक है। अभिषेक बनर्जी के खिलाफ कार्यकर्ताओं की नाराजगी और पार्टी के भीतर पनपते असंतोष को शांत करना ममता के लिए अब सबसे बड़ी प्राथमिकता है।

क्या अभी खत्म हो गया है ममता का जादू?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी को अभी कम आंकना जल्दबाजी होगी। उनके पास अब भी जनता के बीच एक मजबूत आधार है। यदि वह पार्टी के मूल कार्यकर्ताओं और समर्थकों को एकजुट करने में सफल रहती हैं और अदालती लड़ाई में उन्हें राहत मिलती है, तो वह इस पूरे संकट को सहानुभूति में बदलकर बाजी पलट सकती हैं।

भविष्य की दिशा

यह विवाद सिर्फ एक कुर्सी की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह तय करेगा कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले टीएमसी एक मजबूत दल के रूप में बनी रहेगी या फिर अंतर्कलह की भेंट चढ़ जाएगी। ममता के लिए यह समय अपनी राजनीतिक रणनीति को पूरी तरह से बदलने का है। उनके समर्थकों को उम्मीद है कि वे इस तुरुप के इक्के का इस्तेमाल कर पार्टी को बिखरने से जरूर बचा लेंगी।

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