शिवसेना (UBT) में टूट का डर: सांसदों की खरीद-फरोख्त पर उद्धव गुट का बड़ा दावा
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नई दिल्ली: शिवसेना (UBT) में एक बार फिर फूट की अटकलें तेज हो गई हैं। पार्टी के सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर अपनी चिंताएं जाहिर की हैं। उद्धव ठाकरे गुट को डर है कि उनके सांसद पाला बदलकर एकनाथ शिंदे गुट में शामिल हो सकते हैं।

लोकसभा अध्यक्ष को सौंपा प्रतिवेदन शिवसेना (UBT) के नेताओं ने लोकसभा अध्यक्ष को एक औपचारिक पत्र सौंपा है। इसमें मांग की गई है कि दल-बदल विरोधी कानून का कड़ाई से पालन हो और किसी भी गैरकानूनी विलय को रोका जाए। पार्टी का तर्क है कि कानून के अनुसार, केवल मूल राजनीतिक दल का विलय ही मान्य हो सकता है, न कि किसी समूह का।

कानूनी पेंच: दो-तिहाई बहुमत की शर्त पार्टी नेताओं का कहना है कि शिवसेना (UBT) के लोकसभा में कुल नौ सांसद हैं। दल-बदल कानून से बचने के लिए कम से कम छह सांसदों का एक साथ होना जरूरी है। हालांकि, पार्टी नेताओं का जोर इस बात पर है कि संख्या बल होने के बावजूद गुट का विलय नहीं, बल्कि पूरे दल का विलय ही कानूनी रूप से संभव है।

संजय राउत का आरोप: 50 करोड़ का खेल सांसद संजय राउत ने बड़ा खुलासा करते हुए आरोप लगाया है कि पार्टी के सांसदों को तोड़ने के लिए धन की पेशकश की जा रही है। राउत ने दावा किया कि सांसदों को 50-50 करोड़ रुपये का प्रलोभन दिया गया है, जिसमें से 15 करोड़ रुपये एडवांस के रूप में देने की बात कही गई थी। उन्होंने कहा कि बिना पैसे लिए सांसद विमान में बैठने को तैयार नहीं थे।

‘विपक्ष के प्रति वफादार हैं हम’ मुलाकात के बाद अरविंद सावंत, अनिल देसाई और राजाभाऊ वाजे ने स्पष्ट किया कि वे उद्धव ठाकरे के साथ मजबूती से खड़े हैं। लेकिन पार्टी के भीतर बाकी छह सांसदों को लेकर संशय बरकरार है। हालांकि, राउत ने बताया कि ओम बिरला ने उन्हें आश्वासन दिया है कि कोई भी निर्णय लेने से पहले वे कानून के हर पहलू पर बारीकी से विचार करेंगे।

विवादों में संजय राउत की भाषा सांसदों को खरीदने की खबरों के बीच संजय राउत का एक वीडियो भी वायरल हुआ है, जिसमें वे बागी सांसदों के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते नजर आ रहे हैं। सफाई देते हुए राउत ने कहा, मराठी भाषा में हम ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं। जो व्यक्ति जिस भाषा को समझता है, उसके साथ वैसी ही बात करनी चाहिए।

फिलहाल, इस मुलाकात ने महाराष्ट्र की सियासत में हलचल बढ़ा दी है। देखना यह होगा कि लोकसभा अध्यक्ष का रुख इस पूरे मामले पर क्या रहता है और उद्धव ठाकरे अपनी पार्टी को बिखरने से कैसे बचाते हैं।

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