ममता की सल्तनत पर मंडराया संकट: बंगाल में बागी गुट ने दी फ्लोर टेस्ट की चुनौती
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पश्चिम बंगाल की राजनीति में अब तक का सबसे बड़ा सियासी तूफान देखने को मिल रहा है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर छिड़ी बगावत की आग अब ममता बनर्जी की सत्ता को सीधे चुनौती दे रही है। पार्टी के बागी गुट ने दिल्ली के बाद अब कोलकाता में अपनी ताकत का प्रदर्शन करते हुए सरकार के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।

फ्लोर टेस्ट की खुली चुनौती विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (LoP) ऋतब्रत बनर्जी ने ममता बनर्जी को विधानसभा के पटल पर अपना बहुमत साबित करने की चुनौती दी है। ऋतब्रत का दावा है कि उनके पास TMC के कुल 80 विधायकों में से 64 का समर्थन हासिल है। इस बाबत उन्होंने स्पीकर को विधायकों की सूची सौंपकर सदन में तुरंत फ्लोर टेस्ट कराने की मांग भी कर दी है।

हम हैं असली TMC : बागी गुट ऋतब्रत बनर्जी ने स्पष्ट किया है कि वे पार्टी तोड़ नहीं रहे हैं, बल्कि ममता बनर्जी की मूल विचारधारा को बचाने के लिए लड़ रहे हैं। बागी विधायकों का तर्क है कि वे असली TMC हैं। दिलचस्प बात यह है कि विधानसभा के दो-तिहाई से अधिक विधायक अब खुद को ऋतब्रत गुट के साथ जोड़ चुके हैं, जिसे स्पीकर ने भी आधिकारिक रूप से मान्यता दे दी है।

संसद से सड़क तक बगावत यह संकट केवल विधानसभा तक सीमित नहीं है। संसद में भी TMC के 29 में से करीब 20 सांसद बागी तेवर अपना चुके हैं। बागी गुट ने ममता बनर्जी से अपील की है कि वे पार्टी की चेयरपर्सन बनी रहें, लेकिन कार्यप्रणाली में बदलाव जरूरी है। हालांकि, ममता और अभिषेक बनर्जी का खेमा अभी भी अपनी वफादारी साबित करने के लिए लगातार गुप्त बैठकें कर रहा है।

अगला कदम: राजभवन का रुख सूत्रों के अनुसार, बागी गुट जल्द ही राज्यपाल से मिलकर उन्हें ज्ञापन सौंपने की तैयारी में है। वे सरकार के अल्पमत में होने का दावा करते हुए विशेष सत्र बुलाने की मांग करेंगे। दलबदल विरोधी कानून से बचने के लिए बागी खेमे ने दो-तिहाई बहुमत के जादुई आंकड़े को जुटा लिया है, जिससे उनकी सदस्यता सुरक्षित रह सके।

ममता के सामने अस्तित्व की लड़ाई कोलकाता स्थित कालीघाट आवास पर बैठकों का दौर तेज हो गया है। ममता बनर्जी के सामने अब दोहरी चुनौती है—एक तरफ अपनी पार्टी के भीतर के इस बड़े विद्रोह को शांत करना और दूसरी तरफ विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा साबित करना। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह TMC के इतिहास का सबसे निर्णायक मोड़ है। क्या ममता अपनी पुरानी राजनीतिक चतुराई से इसे टाल पाएंगी, या बंगाल में सत्ता का समीकरण पूरी तरह बदल जाएगा? इस पर सबकी नजरें टिकी हैं।

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