ग्रेटर नोएडा में आवारा कुत्तों के साथ बर्बरता: वायरल वीडियो ने पशु सुरक्षा पर खड़े किए गंभीर सवाल
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ग्रेटर नोएडा से हाल ही में सामने आए एक वीडियो ने सोशल मीडिया पर हड़कंप मचा दिया है। इस फुटेज में कुछ व्यक्तियों को कम्युनिटी डॉग्स (गली के कुत्तों) को जाल में फंसाकर जबरन ले जाते हुए देखा जा सकता है। वीडियो में कुत्तों के दर्द से कराहने और रोने की आवाज़ें साफ सुनी जा सकती हैं, जिसने पशु प्रेमियों के बीच भारी आक्रोश पैदा कर दिया है।

RWA की शिकायत और आक्रामक होने का दावा प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह कार्रवाई रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) की शिकायतों के बाद की गई। अधिकारियों ने इन कुत्तों को आक्रामक करार दिया था, जिसके आधार पर उन्हें वहां से हटाने का निर्णय लिया गया। हालांकि, इस दावे ने अब विवाद को जन्म दे दिया है।

आक्रामक की परिभाषा पर उठे सवाल जानवरों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं का आरोप है कि किसी कुत्ते को आक्रामक घोषित करने से पहले कोई वैज्ञानिक मूल्यांकन नहीं किया जाता। सोशल मीडिया पर उठ रहे सवालों के मुताबिक, पहले कुत्तों को उकसाया जाता है या पीटा जाता है, और जब वे डर के कारण प्रतिक्रिया देते हैं, तो उन्हें हमलावर बताकर हटा दिया जाता है। आलोचकों का कहना है कि सिर्फ निवासियों की शिकायत को आधार बना लेना ही काफी नहीं है, व्यवहार की वैज्ञानिक जांच होनी चाहिए।

संवेदनशीलता की कमी और ट्रेनिंग का अभाव पशु कल्याण समर्थकों का तर्क है कि नसबंदी या टीकाकरण के लिए कुत्तों को ले जाना एक अलग प्रक्रिया है, लेकिन जिस तरह से इन कुत्तों को पकड़ा गया, वह अमानवीय है। उन्होंने अथॉरिटी से मांग की है कि जानवरों को पकड़ने वाले कर्मचारियों को प्रशिक्षित किया जाए ताकि वे उनके प्रति संवेदनशील व्यवहार अपना सकें।

सोशल मीडिया पर दो फाड़ हुई जनता इस वीडियो पर इंटरनेट यूज़र्स की राय बंटी हुई है। एक वर्ग इसे पूरी तरह क्रूर और अवैध बता रहा है, जो समाज में जानवरों के प्रति नफरत का प्रतीक है। वहीं, कुछ लोग समर्थन में भी उतरे हैं। समर्थन करने वालों का कहना है कि नेट कैचिंग एक मानक प्रक्रिया है और बच्चों व निवासियों की सुरक्षा के लिए आक्रामक कुत्तों को हटाना ज़रूरी है।

प्रगतिशील समाज का आइना यह घटना केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शहरी हाउसिंग सोसायटियों में रहने वाले लोगों और जानवरों के बीच के टकराव का एक हिस्सा है। जानकारों का कहना है कि एक प्रगतिशील समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह बेज़ुबान प्राणियों के साथ कैसा व्यवहार करता है। फिलहाल, इस मुद्दे ने प्रशासन की कार्यप्रणाली और पशु सुरक्षा कानूनों पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।

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