क्या दुनिया की सबसे सख्त परीक्षा गाओकाओ भी नकल के आगे बेबस है?
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जब भी भारत में पेपर लीक की खबरें आती हैं, तो अक्सर चीन की गाओकाओ (Gaokao) परीक्षा का उदाहरण दिया जाता है। इसे दुनिया की सबसे कठिन और सुरक्षित परीक्षा माना जाता है, जहाँ 1.3 करोड़ छात्र अपनी किस्मत आजमाते हैं। लेकिन क्या सुरक्षा का यह चीनी मॉडल वाकई अभेद्य है? आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां करते हैं।

सुरक्षा का अभेद्य किला? चीन में गाओकाओ के दौरान पूरा देश थम जाता है। सड़कों का शोर कम करने के लिए ट्रैफिक डायवर्ट किए जाते हैं, फैक्ट्रियों को बंद रखा जाता है और परीक्षा केंद्रों पर फेस रिकग्निशन तकनीक के साथ-साथ भारी सुरक्षा बल तैनात होते हैं। प्रश्नपत्र की छपाई से लेकर उसके वितरण तक हर कदम पर कड़ी निगरानी रखी जाती है, ताकि निष्पक्षता बनी रहे।

भारत में क्यों छिड़ी बहस? NEET-UG 2026 पेपर लीक विवाद ने भारत की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 22 लाख छात्रों का भविष्य दांव पर लगने के बाद, सोशल मीडिया और शैक्षणिक गलियारों में गाओकाओ मॉडल की चर्चा तेज हो गई है। लोग पूछ रहे हैं कि भारत चीन जैसी सख्त व्यवस्था क्यों नहीं अपना सकता?

सुरक्षा के बावजूद धांधली का सच हकीकत यह है कि चीन में भी नकल पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। चीन की सुप्रीम पीपुल्स कोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक, नवंबर 2015 से अप्रैल 2024 के बीच 11,000 से अधिक लोगों को परीक्षा से जुड़े अपराधों (नकल रैकेट, उत्तर बेचना, प्रॉक्सी छात्र) के लिए सजा सुनाई गई है। यह साबित करता है कि तकनीक और सुरक्षा के बावजूद अपराधी गिरोह नए-नए रास्ते ढूँढ लेते हैं।

सजा का खौफ चीन में नकल को शिक्षा प्रणाली पर सीधा हमला माना जाता है। यहाँ पकड़े जाने पर तीन से सात साल तक की जेल और भविष्य में किसी भी परीक्षा में बैठने पर आजीवन प्रतिबंध जैसी सख्त सजा का प्रावधान है। शिक्षक से लेकर माफिया तक, किसी को बख्शा नहीं जाता।

भारत के लिए सबक नीट विवाद के बाद, भारत में सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) कानून के प्रभावी क्रियान्वयन की मांग जोर पकड़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कानून बना देना काफी नहीं है; प्रश्नपत्र की सुरक्षा श्रृंखला (Chain of Custody) के हर बिंदु पर मानवीय हस्तक्षेप कम करना और जवाबदेही तय करना जरूरी है।

निष्कर्ष: क्या पूर्ण सुरक्षा संभव है? चीन का अनुभव बताता है कि 100 प्रतिशत त्रुटिहीन परीक्षा प्रणाली बनाना लगभग असंभव है। लेकिन आधुनिक तकनीक, सख्त कानून और त्वरित न्यायिक कार्रवाई के जरिए इसे न्यूनतम किया जा सकता है। भारत के लिए सबक यह है कि सुधार केवल कागजों पर नहीं, बल्कि धरातल पर पारदर्शिता के साथ दिखने चाहिए।

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