सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कंडेय काटजू ने 80 साल की उम्र में राजनीति के गलियारों में एक नई पार्टी का ऐलान कर सबको चौंका दिया है। इस पार्टी का नाम है इश्क करो पार्टी और इसका नारा है— युद्ध नहीं, प्रेम करो । सुनने में यह किसी फिल्म का शीर्षक लग सकता है, लेकिन इसके पीछे के अर्थ और इरादे काफी गहरे और तीखे हैं।
आसान शब्दों में समझें कि यह पार्टी क्या है और काटजू का असली एजेंडा क्या है।
सोशल मीडिया पर इस नाम को लेकर खूब चुटकुले बने। किसी ने इसे डेटिंग पार्टी कहा, तो किसी ने लव जिहाद से जोड़ दिया। हालांकि, जस्टिस काटजू का कहना है कि यह कोई रोमांटिक मंच नहीं है।
उनके अनुसार, उर्दू और सूफी परंपरा में इश्क का मतलब ईश्वर या मानवता के प्रति वह गहरा प्रेम है, जिसमें जाति, धर्म और नस्ल की दीवारें गिर जाती हैं। यह नफरत की राजनीति का जवाब देने के लिए एक सूफी राजनीतिक विचार है।
काटजू का मानना है कि भारत आज गंभीर संकटों से जूझ रहा है—बेरोजगारी, कुपोषण, महंगाई और सबसे बढ़कर, धर्म के नाम पर फैला नफरत का जहर। उनका तर्क है कि मौजूदा राजनीतिक दल लोगों को बांटने का काम कर रहे हैं।
इश्क करो पार्टी को उन्होंने एक ऐसे डिजिटल मंच के रूप में पेश किया है जो:
इस पूरे घटनाक्रम में टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा का नाम चर्चा में है। काटजू ने उन्हें इस मंच में शामिल होने का संकेत दिया है। इसके पीछे की वजह महुआ की आक्रामक और निडर राजनीतिक शैली है। काटजू शायद ऐसे नेताओं को एक मंच पर लाना चाहते हैं जो संसद और सार्वजनिक जीवन में सरकार पर तीखे सवाल दागने से नहीं डरते। क्या महुआ इस प्रेम वाले मंच का हिस्सा बनेंगी? यह अभी भी बड़ा सस्पेंस है।
यह पहली बार नहीं है जब काटजू ने व्यंग्यात्मक राजनीति का सहारा लिया है। वे इससे पहले कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) जैसे काल्पनिक मंचों के जरिए भ्रष्ट राजनीति पर कटाक्ष करते रहे हैं।
काटजू की रणनीति साफ है—वे पारंपरिक चुनाव लड़ने वाले नेता नहीं बनना चाहते। वे डिजिटल प्रोवोकेटर की भूमिका में हैं। वे जानते हैं कि आज के दौर में मीम्स, ट्वीट और कंट्रोवर्सी से ही विमर्श खड़ा किया जा सकता है।
जस्टिस काटजू का गेम प्लान साफ है: वे नफरत और विभाजन के नैरेटिव के बीच अचानक प्रेम और एकता का शब्द उछालकर पूरे सिस्टम को असहज करना चाहते हैं। यह कोई चुनाव लड़ने वाली पार्टी नहीं, बल्कि एक विचारधारात्मक दबाव समूह है।
तय यह है कि जब भी काटजू कुछ नया कहते हैं, तो वे बहस छेड़ ही देते हैं। इश्क करो पार्टी सफल हो या न हो, लेकिन इसका संदेश यह है कि भारत की मौजूदा नफरत भरी राजनीति का विकल्प सिर्फ युद्ध नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा इश्क हो सकता है।
i don t know what i can say that can t get me into trouble. and i don t even have a lawyer friend who d bail me out. pic.twitter.com/qMdBPPnbCd
— Nirwa Mehta (@nirwamehta) June 7, 2026
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