POK का अलग राष्ट्रपति-PM और झंडा क्यों है? पाकिस्तान के इस खौफनाक छल का सच
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पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में हाल ही में भड़की भीषण हिंसा और जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी के नेतृत्व में हुए विद्रोह ने इस्लामाबाद की नींव हिला दी है। इस अशांति के बीच एक बड़ा सवाल सुर्खियां बटोर रहा है: अगर PoK पर पाकिस्तान का ही पूर्ण नियंत्रण है, तो वहां अलग राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और अपना झंडा क्यों है?

क्या यह कश्मीरियों की आज़ादी है या रावलपिंडी के सैन्य मुख्यालय (GHQ) द्वारा बुना गया एक कुटिल चक्रव्यूह? आइए, इस राजनीतिक प्रपंच के पीछे की कड़वी हकीकत को समझते हैं।

1947 का वह कूटनीतिक धोखा

अगस्त 1947 में जब महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए, तो पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग बन गया। लेकिन कबाली भेष में आई पाकिस्तानी सेना ने एक हिस्से पर अवैध कब्जा कर लिया।

पाकिस्तान इसे अपना प्रांत घोषित कर सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। विशेषज्ञों के अनुसार, पाकिस्तान को डर था कि यदि उसने इसे अपना वैध प्रांत बनाया, तो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जम्मू-कश्मीर पर उसका दावा कानूनी रूप से खत्म हो जाएगा। इसलिए, दुनिया को भ्रमित करने के लिए उसने इसे आज़ाद जम्मू और कश्मीर का कृत्रिम नाम दे दिया।

स्वायत्तता का नाटक: कागजों पर शासक, हकीकत में गुलाम

PoK में लोकतंत्र का एक दिखावटी ढांचा है। वहां विधानसभा है, प्रधानमंत्री है और राष्ट्रपति भी। लेकिन इस पूरी व्यवस्था का रिमोट कंट्रोल मुज़फ़्फ़राबाद में नहीं, बल्कि इस्लामाबाद और रावलपिंडी के जनरलों के पास है।

इस धोखे को तीन बिंदुओं से समझा जा सकता है:

वैचारिक वफादारी और चुनाव का खेल

PoK की चुनावी प्रक्रिया किसी लोकतंत्र का हिस्सा नहीं, बल्कि एक जेल जैसी है। वहां चुनाव लड़ने के लिए हर उम्मीदवार को लिखित शपथ लेनी पड़ती है कि वह कश्मीर के पाकिस्तान में विलय का समर्थन करता है। जो भी इस नीति के खिलाफ आवाज उठाता है, उस पर देशद्रोह का ठप्पा लगा दिया जाता है।

इसके अलावा, इस्लामाबाद ने मतदान में धांधली के लिए शरणार्थी सीटों का एक जाल बुना है। इन सीटों पर PoK के निवासी नहीं, बल्कि पाकिस्तान के अन्य शहरों में बसे 4.34 लाख लोग वोट डालते हैं। यह व्यवस्था मुज़फ़्फ़राबाद में रावलपिंडी की पसंद की सरकार चुनने के लिए बनाई गई है।

मुखौटा उतरा, अब बगावत की बारी

दशकों से चल रहा पाकिस्तान का यह प्रपंच अब बेनकाब हो चुका है। महंगाई, भुखमरी और बिजली की किल्लत के बीच वहां के आम नागरिकों को समझ आ गया है कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का यह तमाशा सिर्फ उनके शोषण को ढंकने का एक मुखौटा है।

हालिया विरोध प्रदर्शनों में हुई मौतों ने यह साबित कर दिया है कि पाकिस्तान के लिए PoK की ज़मीन तो महत्वपूर्ण है, लेकिन वहां के लोग सिर्फ गुलाम हैं। रावलपिंडी के सैन्य बैरकों में बैठे असली शोषकों के खिलाफ आज कश्मीरी अवाम का गुस्सा फूट पड़ा है और यह स्वतंत्रता का नाटक अब पूरी तरह तार-तार हो चुका है।

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