मालवीय नगर अग्निकांड: मौत के बाद अवैध का ठप्पा, क्या जिम्मेदार हमेशा हादसे का इंतज़ार करते हैं?
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दिल्ली के मालवीय नगर इलाके में बुधवार सुबह एक होटल में लगी भीषण आग ने 21 लोगों की जान ले ली है। मृतकों में बड़ी संख्या में विदेशी नागरिक शामिल हैं, जो मध्य एशिया और अफ्रीकी देशों से आए थे। इस हादसे ने एक बार फिर दिल्ली की लचर प्रशासनिक व्यवस्था और सुरक्षा मानकों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सुबह 8:50 बजे का खौफनाक मंजर दमकल विभाग के अनुसार, आग सुबह 8:50 बजे होटल के रेस्टोरेंट से शुरू हुई। देखते ही देखते लपटों ने ऊपरी मंजिलों और बेसमेंट को अपनी चपेट में ले लिया। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में लोग अपनी जान बचाने के लिए तीसरी और चौथी मंजिल से कूदते नजर आए। स्थानीय लोगों ने गद्दे बिछाकर कुछ लोगों की जान बचाने की कोशिश की। राहत कार्य के दौरान अब तक 40 लोगों को बाहर निकाला गया है, जिनमें से कई की हालत गंभीर है।

छह महीने में 66 मौतों का काला आंकड़ा दिल्ली में पिछले छह महीनों के दौरान आग की घटनाओं में मरने वालों की संख्या 66 तक पहुंच गई है। जनवरी में 6, फरवरी में 6, मार्च में 15, अप्रैल में 5, मई में 13 और जून में अब तक 21 लोगों की मौत हो चुकी है। ये आंकड़े बताते हैं कि शहर में सुरक्षा के दावे कितने खोखले हैं।

अनुमति 6 कमरों की, चला रहे थे 25 जांच में खुलासा हुआ है कि जिस होटल में यह हादसा हुआ, वह पूरी तरह अवैध था। इसे केवल बेड एंड ब्रेकफास्ट योजना के तहत 6 कमरों के लिए लाइसेंस मिला था, लेकिन मालिक ने नियमों को ताक पर रखकर 25 कमरे और एक रेस्टोरेंट बना रखा था। सबसे खतरनाक बात यह रही कि पूरी इमारत में आने-जाने के लिए केवल एक संकरा रास्ता था और होटल के पास कोई फायर एनओसी (NOC) भी नहीं थी।

हादसे के बाद प्रशासन की जागी नींद हर बार की तरह इस बार भी हादसे के बाद प्रशासन हरकत में आया है। पुलिस ने होटल मालिक के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज किया है। सरकार ने जांच के लिए उच्च स्तरीय कमेटी बनाई है और सभी बेड एंड ब्रेकफास्ट इकाइयों को सील करने के आदेश दिए हैं। साथ ही मृतकों के परिजनों के लिए आर्थिक सहायता का भी ऐलान किया गया है।

असली सवाल: हादसे से पहले कहां थे जिम्मेदार? सवाल यह है कि क्या किसी भी इमारत को अवैध घोषित करने के लिए उसमें मौत का तांडव होना जरूरी है? जब नगर निगम, दमकल विभाग और स्थानीय प्रशासन के अधिकारी दफ्तरों में बैठे होते हैं, तो क्या उन्हें संकरी गलियों में धड़ल्ले से चल रहे अवैध होटलों और बारूद के ढेर बने रिहायशी इलाकों की भनक नहीं होती? मुआवजे और सीलिंग के आदेश तब तक सिर्फ कागजी खानापूर्ति हैं, जब तक प्रशासन अपनी जिम्मेदारी हादसे के बाद नहीं, बल्कि उससे पहले निभाना नहीं सीखता।

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