माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करना आज भी दुनिया के सबसे बड़े रोमांचों में से एक है, लेकिन 2026 का सीजन इसके एक भयावह पहलू को उजागर कर गया है। इस साल नेपाल सरकार ने रिकॉर्ड 494 विदेशी पर्वतारोहियों को परमिट दिए, जिसके बाद समिट करने वालों की संख्या 900 के पार पहुंच गई। इस भीड़ ने न केवल पर्वतारोहियों के लिए ट्रैफिक जाम जैसी स्थिति पैदा की, बल्कि पहाड़ पर कचरे का एक ऐसा संकट खड़ा कर दिया है जो अब पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बन गया है।
रूसी पर्वतारोही एंजेलोवा द्वारा साझा की गई तस्वीरों ने दुनिया को चौंका दिया है। समुद्र तल से लगभग 7,900 मीटर की ऊंचाई पर स्थित साउथ कोल कैंप अब कचरे के ढेर में बदल चुका है। जानकारों के अनुसार, यहाँ 40 से 50 टन कचरा जमा है, जिसमें ऑक्सीजन सिलेंडर, टूटे हुए टेंट, प्लास्टिक और मानव अपशिष्ट शामिल हैं। अत्यधिक ठंड के कारण यह कचरा सड़ता नहीं है, बल्कि सदियों तक जस का तस पड़ा रहता है।
साउथ कोल कैंप डेथ जोन में आता है। यहाँ ऑक्सीजन की मात्रा इतनी कम होती है कि मानव शरीर का जीवित रहना ही एक संघर्ष है। अक्सर बर्फीले तूफानों और अचानक खराब होते मौसम के बीच पर्वतारोहियों की प्राथमिकता अपनी जान बचाना होती है। इस आपाधापी में वे अपना भारी सामान और उपकरण वहीं छोड़ देते हैं। समय के साथ यही आपातकालीन सामान कचरे के विशाल ढेर में तब्दील हो गया है।
नेपाल सरकार ने पर्वतारोहियों के लिए कचरा वापस लाने और सुरक्षा राशि जमा करने जैसे नियम तो बनाए हैं, लेकिन इनका असर ऊपरी कैंपों में नगण्य है। एक पर्वतारोही औसतन 8 किलो कचरा पैदा करता है। बेस कैंप तक कचरा लाना तो संभव है, लेकिन डेथ जोन जैसी जानलेवा ऊंचाई से भारी सामान नीचे लाना बेहद जोखिम भरा और चुनौतीपूर्ण काम है। यही कारण है कि एवरेस्ट का ऊपरी हिस्सा अब कचराघर बनता जा रहा है।
यह समस्या सिर्फ एवरेस्ट के सौंदर्य तक सीमित नहीं है, बल्कि अब यह स्वास्थ्य से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन गई है। जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। ग्लेशियर पिघलने से सालों से दबी गंदगी और रासायनिक पदार्थ जल स्रोतों में मिल रहे हैं। एवरेस्ट से निकलने वाली जलधाराएं नीचे बसे हजारों गांवों की जीवन रेखा हैं। अगर समय रहते इसे नहीं रोका गया, तो यह जहरीला कचरा स्थानीय लोगों की सेहत के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।
नेपाल सरकार ने 2025-2029 की नई कार्ययोजना के तहत रेंजर्स की नियुक्ति और पर्यावरण के अनुकूल पैकेजिंग को अनिवार्य करने का निर्णय लिया है। हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि सिर्फ नियम काफी नहीं हैं। जब तक पर्वतारोहण के व्यवसायीकरण पर लगाम नहीं लगाई जाती और सख्त निगरानी नहीं की जाती, तब तक एवरेस्ट को इस कचरे के दलदल से बचाना मुश्किल होगा। दुनिया की सबसे ऊंची चोटी का अस्तित्व अब केवल पर्वतारोहियों के जुनून पर नहीं, बल्कि पर्यावरण के प्रति उनकी जिम्मेदारी पर टिका है।
This is Camp IV on Mt Everest (~7,900 m), the highest campsite on Earth and the final stop before the summit.
— Everest Today (@EverestToday) June 1, 2026
What should be one of the most extraordinary places on the planet has, in many ways, become one of the ugliest faces of Everest s commercialisation. Abandoned tents,… pic.twitter.com/0Th04sCa5J
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