क्या है झंगोरा ? जिसे जानने के लिए CJI ने दुकानदार से पूछ डाले सवाल
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सोशल मीडिया पर इन दिनों जोशीमठ का एक वीडियो खूब सुर्खियां बटोर रहा है। इस वीडियो में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत एक स्थानीय दुकान पर खरीदारी करते हुए दुकानदार से झंगोरा के बारे में जानकारी लेते नजर आ रहे हैं। इस वायरल वीडियो ने न केवल उत्तराखंड के पारंपरिक अनाज को चर्चा में ला दिया है, बल्कि लोगों में इसे जानने की उत्सुकता भी बढ़ा दी है।

आखिर झंगोरा क्या है?

झंगोरा मुख्य रूप से उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में उगाया जाने वाला एक मोटा अनाज है, जिसे अंग्रेजी में बार्नयार्ड मिलेट (Barnyard Millet) कहा जाता है। इसे कई लोग सांवा या सामक चावल की श्रेणी में भी देखते हैं। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह कम पानी और कठिन पहाड़ी मौसम में भी आसानी से उग जाता है।

पहाड़ों का सुपरफूड

सदियों से पहाड़ों पर रहने वाले लोगों के लिए झंगोरा मुख्य भोजन का हिस्सा रहा है। यह न केवल पेट भरने का जरिया है, बल्कि एक बेहद पौष्टिक विकल्प भी है। फिटनेस के प्रति जागरूक लोग अब सफेद चावल के विकल्प के रूप में इसे अपनी डाइट में शामिल कर रहे हैं, क्योंकि इसमें फाइबर और अन्य जरूरी मिनरल्स भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं।

क्यों खास है झंगोरे की खीर ?

उत्तराखंड के पारंपरिक खानपान में झंगोरे की खीर का अपना एक अलग स्थान है। दूध, गुड़ और सूखे मेवों के साथ बनाई जाने वाली यह खीर न केवल स्वादिष्ट होती है, बल्कि ऊर्जा का बेहतरीन स्रोत भी मानी जाती है। जो भी पर्यटक उत्तराखंड जाते हैं, वे इस डिश का स्वाद लेना नहीं भूलते। इसका स्वाद सामान्य चावल की खीर से काफी अलग और अनूठा होता है।

मिलेट्स की लहर और बदलती तस्वीर

पिछले कुछ वर्षों में मिलेट्स (मोटा अनाज) की वैश्विक लोकप्रियता बढ़ी है। इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स के बाद से लोग अब ऐसे अनाजों की ओर लौट रहे हैं जो स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हैं। झंगोरा की बढ़ती मांग से अब उत्तराखंड के स्थानीय किसानों को भी नई उम्मीदें जगी हैं। अब झंगोरे से बने पैकेज्ड उत्पाद भी बाजार में तेजी से अपनी जगह बना रहे हैं।

एक वीडियो ने बदली किस्मत

सोशल मीडिया की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जोशीमठ की एक छोटी सी दुकान पर CJI द्वारा पूछा गया एक सवाल, आज देशभर में चर्चा का विषय बन गया है। जो अनाज कभी केवल पहाड़ी घरों तक सीमित था, आज उसे देशभर में पहचाना और सराहा जा रहा है। यह वीडियो साबित करता है कि पारंपरिक उत्पादों को अगर सही पहचान मिले, तो वे आज के आधुनिक दौर में भी मील का पत्थर साबित हो सकते हैं।

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