मंदिर में VIP कल्चर पर अदालत की दो-टूक: भगवान के घर में अमीर-गरीब का भेद क्यों?
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भारत के तीर्थस्थलों पर घंटों कतार में खड़े होने के बाद जब आपकी नजर किसी ऐसे व्यक्ति पर पड़ती है जो सीधे भगवान के सामने पहुंच जाता है, तो मन में टीस उठना स्वाभाविक है। मंदिरों में VIP संस्कृति कोई नई बात नहीं है, लेकिन अब मद्रास हाईकोर्ट ने इस व्यवस्था पर कड़ा प्रहार किया है।

अदालत का सवाल: क्या भगवान भी VIP के इंतजार में हैं?

मद्रास हाईकोर्ट की अवकाशकालीन पीठ ने मंदिरों में पैसे लेकर कराए जाने वाले वीआईपी दर्शन पर तीखी टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा, भगवान के सामने सभी समान हैं। मंत्री और विधायक यह न समझें कि वे कभी भी मंदिर पहुंचेंगे और भगवान उनका इंतजार कर रहे होंगे। अदालत ने पैसे लेकर दर्शन कराने की परंपरा को भेदभावपूर्ण और गलत करार दिया है।

सरकार और मंदिर प्रशासन के तर्क

कोर्ट में राज्य सरकार ने राजस्व का हवाला देते हुए वीआईपी व्यवस्था का बचाव किया। प्रशासन का तर्क है कि इस राशि का उपयोग मंदिर के विकास, मरम्मत और सामाजिक कार्यों में किया जाता है। साथ ही, भीड़ प्रबंधन के लिए भी इसे जरूरी बताया जाता है। समर्थकों का कहना है कि यह व्यवस्था बुजुर्गों और दिव्यांगों के लिए राहत का काम करती है और किसी को इसके लिए मजबूर नहीं किया जाता।

आम भक्त का नजरिया

कतार में लगे आम श्रद्धालुओं का मानना है कि मंदिर में चढ़ावे और दान की कमी नहीं है, जिससे व्यवस्थाएं सुधारी जा सकती हैं। उनका तर्क है कि पर्ची सिस्टम आर्थिक और वर्गीय भेदभाव पैदा करता है। भक्त चाहते हैं कि धर्म के केंद्र में भगवान के सामने सबको समान दर्जा ही मिलना चाहिए।

मुनाफे का गणित: वीआईपी दर्शन से कमाई के आंकड़े

मंदिरों में वीआईपी दर्शन केवल सुविधा नहीं, बल्कि कमाई का बड़ा जरिया भी बन गए हैं:

आगे की राह: नीतिगत मुद्दा या कानूनी दखल?

मंदिरों में वीआईपी संस्कृति पर कोर्ट का रुख समय-समय पर बदलता रहा है। सुप्रीम कोर्ट पहले भी इसे नीतिगत मामला बताकर मंदिर प्रशासनों पर छोड़ चुका है। हालांकि, बांके बिहारी मंदिर और अयोध्या के राम मंदिर जैसे कई स्थानों पर अब सुगम और सामान्य दर्शन की निःशुल्क व्यवस्था की जा रही है, जो यह संकेत देती है कि बदलाव की बयार बहने लगी है।

फिलहाल, मद्रास हाईकोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार की दलीलों को खारिज कर दिया है और सुनवाई छह सप्ताह के लिए टाल दी है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अदालत का यह रुख देशभर के मंदिरों में VIP कल्चर के अंत की शुरुआत बनेगा।

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