क्यों बेहद खतरनाक और संवेदनशील है भारत-पाक सीमा का हरामी नाला ?
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जब भी भारत-पाकिस्तान सीमा की सुरक्षा का जिक्र होता है, तो अक्सर लोगों को राजस्थान की तपती रेत या कश्मीर की पहाड़ियाँ याद आती हैं। लेकिन गुजरात के कच्छ में स्थित हरामी नाला सुरक्षा एजेंसियों के लिए इनसे भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। यह इलाका न केवल भौगोलिक रूप से जटिल है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से सबसे संवेदनशील बिंदुओं में से एक है।

क्या है हरामी नाला ? हरामी नाला 22 किलोमीटर लंबा एक समुद्री चैनल है। इसका एक बड़ा हिस्सा अरब सागर के खारे पानी से भरा है, तो लगभग आठ किलोमीटर का क्षेत्र दलदली जमीन है। यहाँ की सबसे बड़ी समस्या ज्वार-भाटा (tide) है, जिसके कारण पानी की गहराई और रास्तों की दिशा हर पल बदलती रहती है। यहाँ स्थायी सीमा चिह्न बनाना तकनीकी रूप से लगभग असंभव है।

अजीब नाम के पीछे की असलियत इस क्षेत्र का नाम हरामी नाला स्थानीय लोगों के अनुभव से पड़ा है। यहाँ के समुद्री रास्ते और दलदल इतने अनिश्चित हैं कि कोई व्यक्ति कभी यह अनुमान नहीं लगा सकता कि आगे क्या स्थिति मिलेगी। इस अप्रत्याशित स्वभाव के कारण स्थानीय बोलचाल में इसे हरामी कहा जाने लगा, जो बाद में पूरे देश में इसी नाम से मशहूर हो गया।

दुश्मन की घुसपैठ का रहा है गढ़ लंबे समय से यह इलाका आतंकवादियों और तस्करों के लिए गुप्त प्रवेश द्वार की तरह इस्तेमाल होता रहा है। 26/11 मुंबई हमलों के दौरान आतंकवादी इसी समुद्री रास्ते से भारत में दाखिल हुए थे, जिसके बाद इस क्षेत्र की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। पाकिस्तानी मछुआरों का अनजाने या जानबूझकर सीमा पार करना भी यहाँ की सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती है।

बीएसएफ के सामने अदृश्य चुनौतियाँ यहाँ तैनात जवानों को इंसानी दुश्मनों के अलावा कुदरत से भी लड़ना पड़ता है। दलदल इतना गहरा है कि गश्ती नावें फंस जाती हैं। जवानों को विशेष गमबूट पहनकर चलना पड़ता है ताकि समुद्री जीवों और शंखों से खुद को बचाया जा सके। भीषण गर्मी, तेज समुद्री हवाएं और आबादी से कोसों दूर रहने की मजबूरी इस काम को बेहद कठिन बनाती है।

आधुनिक तकनीक से मिल रही मजबूती जमीन दलदली होने के कारण यहाँ पक्के निर्माण मुश्किल हैं, इसलिए बीएसएफ तैरती चौकियों और अस्थायी सेंट्री पोस्ट का सहारा लेती है। हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने यहाँ कई महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों का उद्घाटन किया है। 9.5 मीटर ऊंचे ऑब्जर्वेशन टावर और अत्याधुनिक निगरानी कैमरों के लगने से अब जवानों की नजरें सीमा के चप्पे-चप्पे पर हैं।

क्रोकोडाइल कमांडो और नई सड़कों के निर्माण से यहाँ की सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक घातक और चौकस बना दिया गया है। हरामी नाला की भौगोलिक चुनौतियां भले ही बरकरार हों, लेकिन अब तकनीक और जवानों की सतर्कता ने इसे घुसपैठियों के लिए एक अभेद्य दीवार में तब्दील कर दिया है।

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