सिर्फ ₹30,000 के ड्रोन ने इजरायल की बढ़ाई मुश्किलें, फेल हो रहा आयरन डोम का सुरक्षा कवच
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इजरायल के अत्याधुनिक सुरक्षा तंत्र के सामने अब एक ऐसा खतरा खड़ा है, जिसकी कीमत महज 30,000 रुपये है। लेबनान का हिज्बुल्लाह संगठन एफपीवी (FPV) फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन के जरिए इजरायल के अरबों डॉलर के डिफेंस सिस्टम को चुनौती दे रहा है।

जैमर का इन पर नहीं होता असर इन ड्रोन्स की सबसे बड़ी ताकत इनका ‘फाइबर ऑप्टिक’ केबल से जुड़ा होना है। पारंपरिक ड्रोन रेडियो सिग्नल पर काम करते हैं, जिन्हें इजरायल का आयरन डोम या अन्य इलेक्ट्रॉनिक जैमर आसानी से जाम कर देते हैं। लेकिन ये नए ड्रोन ऑपरेटर से सीधे केबल के जरिए नियंत्रित होते हैं, जिससे जैमिंग का इन पर कोई असर नहीं पड़ता।

आंखों के सामने सटीक निशाना फाइबर-ऑप्टिक तकनीक के कारण ऑपरेटर आखिरी सेकंड तक ड्रोन पर सटीक नजर रख सकता है। वह हमले के दौरान भी ड्रोन की दिशा बदल सकता है, जिससे इजरायली सेना के लिए इनका पता लगाना और इन्हें बीच में ही गिराना लगभग नामुमकिन सा हो गया है।

यूक्रेन युद्ध से सीखी रणनीति विशेषज्ञों का मानना है कि हिज्बुल्लाह ने यह तकनीक रूस-यूक्रेन युद्ध से सीखी है। वहां के युद्ध ने साबित कर दिया है कि सस्ते ड्रोन एक आधुनिक सेना के लिए कितने घातक हो सकते हैं। ईरान से मिली टेक्नोलॉजी और इसी सस्ते और घातक मॉडल का इस्तेमाल कर हिज्बुल्लाह ने इजरायली सीमा पर एक बड़ा नेटवर्क तैयार कर लिया है।

सीमावर्ती इलाकों में दहशत रॉकेट हमलों में सायरन बजने से लोगों को कुछ सेकंड का समय मिल जाता है, लेकिन इन ड्रोन हमलों में हमले के समय तक लोगों को भनक तक नहीं लगती। शोमेरा जैसे सीमावर्ती शहरों में अब रॉकेट से ज्यादा ड्रोन का खौफ है। लगातार मंडराते इन ड्रोन्स ने वहां रहने वाले नागरिकों और सैनिकों में मनोवैज्ञानिक दबाव पैदा कर दिया है।

वीडियो वार से बढ़ा रहा दबाव हिज्बुल्लाह केवल हमला ही नहीं कर रहा, बल्कि हमलों के वीडियो सोशल मीडिया पर जारी कर प्रोपगेंडा वॉर भी लड़ रहा है। इससे न केवल उनके लड़ाकों का मनोबल बढ़ता है, बल्कि इजरायल की सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरी को दुनिया के सामने प्रदर्शित कर वह दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है।

इजराइल का एंटी-ड्रोन प्लान इस बढ़ते खतरे को देखते हुए इजरायल ने अपने सैन्य ठिकानों को सुरक्षा जाली (nets) से ढंकना शुरू कर दिया है। साथ ही कई नई एंटी-ड्रोन तकनीकों और इंटरसेप्टर ड्रोन्स पर भी काम चल रहा है। हालांकि, सैन्य विशेषज्ञ मान रहे हैं कि जब तक कोई व्यापक राजनीतिक समाधान नहीं निकलता, तब तक इन छोटे ड्रोन्स का खतरा बना रहेगा।

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