बशीर बद्र: अलविदा उस शायर को जिसने चांद के साथ जाना चुना
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उर्दू अदब का एक चमकता सितारा हमेशा के लिए खामोश हो गया है। मशहूर शायर बशीर बद्र का 91 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे। उनके जाने से साहित्य जगत में एक गहरा शून्य पैदा हो गया है, जिसे भर पाना असंभव है।

साहित्यिक गलियारों में शोक बशीर बद्र का नाम उस पीढ़ी के लिए एक धरोहर जैसा था, जिसने शायरी को किताबों से निकालकर हॉस्टल के कमरों और चाय की दुकानों की चर्चाओं तक पहुंचाया। उनके निधन की खबर आते ही कला और साहित्य प्रेमियों में शोक की लहर दौड़ गई। प्रसून जोशी समेत कई साहित्यकारों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी है।

वो शायर जिसने फासलों को जीना सिखाया बशीर बद्र की शायरी की सबसे बड़ी खूबसूरती उसकी सहजता थी। उन्होंने जटिल अरबी-फारसी शब्दों के बोझ के बिना आम बोलचाल की भाषा में जीवन के गहरे दर्शन लिखे। उनकी ये पंक्तियां आज भी हर उस व्यक्ति के जहन में ताजा हैं जो आधुनिक शहर की भागदौड़ को समझता है:

कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो

ये पंक्तियां महज शब्द नहीं, बल्कि बदलती सामाजिक संवेदनाओं का आईना थीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि आधुनिकता के इस दौर में संबंधों का संतुलन कैसे बनाए रखा जाए।

सत्ता पर तंज और मानवीय करुणा बशीर बद्र अपनी शायरी के जरिए सत्ता की विद्रूपताओं पर भी सटीक प्रहार करते थे। उन्होंने घर उजड़ने के दर्द को जिस शिद्दत से महसूस किया, वह उनके इस शेर में झलकता है:

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में

वे केवल एक शायर नहीं थे, बल्कि एक संवेदनशील शिक्षक की तरह थे, जो समाज को मनुष्यता का पाठ पढ़ाते थे। उनके लेखन में अभिव्यक्ति की आजादी के खतरे और चुप्पी की बेबसी का दर्द साफ झलकता था।

काव्य जीवन का अनिवार्य हिस्सा आज के दौर में जब कविता और साहित्य धीरे-धीरे हाशिए पर जा रहे हैं, बशीर बद्र का जाना इस बात की याद दिलाता है कि एक समाज का काव्य बोध मरना, उसकी अपनी मृत्यु की यात्रा है। वे अपनी शायरी से समाज और सत्ता को लगातार आईना दिखाते रहे।

उनकी अंतिम पंक्तियां, जो आज उनके जाने के बाद सच प्रतीत हो रही हैं, उनके व्यक्तित्व को पूरी तरह परिभाषित करती हैं:

एक मुद्दत से इसी जिद में छुपा बैठा हूं, चांद खुद लेने मुझे आएगा तो जाऊंगा

कल चांद उन्हें अपने साथ ले ही गया। बशीर बद्र भले ही हमारे बीच न हों, लेकिन उनकी गजलों की महक और इंसानी जज्बातों की गूंज तब तक बनी रहेगी, जब तक मनुष्य अपनी मनुष्यता पर विचार करता रहेगा।

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