1965 की वो काली रात, जब खदान में दफन हो गए 268 मजदूर; धोरी हादसे की खौफनाक दास्तान
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28 मई, 1965 का दिन भारत के औद्योगिक इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक है। आज ही के दिन धनबाद (तत्कालीन बिहार, अब झारखंड) की धोरी कोयला खदान में एक ऐसा भीषण हादसा हुआ, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। इस हादसे में 268 मजदूरों ने अपनी जान गंवा दी थी।

रात के सन्नाटे में हुआ जलजला रात का करीब एक बज रहा था। एक शिफ्ट खत्म होने के कारण मजदूर खदान से बाहर निकल रहे थे, जबकि दूसरी शिफ्ट के कर्मचारी अंदर जाने की तैयारी में थे। तभी जमीन के भीतर एक जोरदार धमाका हुआ। विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि धरती कांप उठी। खदान के अंदर जहरीली गैस, आग और धुएं का गुबार भर गया। सुरंगें ढह गईं और अंदर मौजूद सैकड़ों मजदूर काल के गाल में समा गए।

35 बचाव दल भी नहीं बचा पाए जान हादसे के बाद कोहराम मच गया। अपनों को खोजने के लिए खदान के बाहर परिजनों की भीड़ जमा हो गई। सरकार ने राहत और बचाव के लिए 35 टीमें तैनात कीं, लेकिन खदान के अंदर के हालात इतने खतरनाक थे कि बचाव कार्य बेहद मुश्किल हो गया। कई दिनों तक चले इस संघर्ष के बाद अंततः 268 मजदूरों के शव बरामद हुए।

गैस का रिसाव बना मौत का कारण सरकारी जांच रिपोर्ट के मुताबिक, खदान के भीतर ज्वलनशील गैस के जमा होने से यह विस्फोट हुआ था। उस समय खदानों में आधुनिक सुरक्षा इंतजामों का अभाव था। सुरक्षा के नाम पर केवल सेफ्टी लैंप का सहारा लिया जाता था और वेंटिलेशन (हवा की आवाजाही) की व्यवस्था भी न के बराबर थी।

राजनीतिक गलियारों में मचा हड़कंप इस हादसे ने तत्कालीन सरकार और सुरक्षा मानकों पर बड़े सवाल खड़े कर दिए। मामले की गंभीरता को देखते हुए रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस एस.के. दास के नेतृत्व में एक जांच आयोग गठित किया गया। रिपोर्ट में खदानों में सुरक्षा नियमों की घोर अनदेखी और भ्रष्टाचार की परतें खुलकर सामने आईं।

सांसद निशिकांत दुबे ने उठाए सवाल हाल ही में गोड्डा से सांसद निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया पर इस हादसे को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि खदानों में मौत का सिलसिला बहुत पहले से जारी था। उन्होंने दावा किया कि मजदूरों द्वारा नेहरू सरकार से बार-बार शिकायत करने के बावजूद राजनीतिक दबाव और भ्रष्टाचार के चलते सुरक्षा मानकों को ताक पर रखा गया, जिसका नतीजा धोरी खदान हादसे के रूप में सामने आया।

बदलाव की बुनियाद बना यह हादसा धोरी हादसे ने भारत में खदान सुरक्षा के नियमों को पूरी तरह बदलने पर मजबूर कर दिया। जांच रिपोर्ट की सिफारिशों के बाद खदानों में आधुनिक गैस डिटेक्टर लगाने, नियमित वेंटिलेशन जांच और फायर सेफ्टी ट्रेनिंग को अनिवार्य बनाया गया। यह त्रासदी महज एक दुर्घटना नहीं थी, बल्कि उन मजदूरों की दर्दनाक कहानी है, जिन्होंने पेट की आग बुझाने के लिए अपनी जान दांव पर लगा दी थी।

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