बकरीद 2026: देशभर में आस्था का सैलाब, त्याग और समर्पण के साथ मनाई गई ईद-उल-अजहा
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आज पूरे भारत में ईद-उल-अजहा यानी बकरीद का त्योहार हर्षोल्लास और अकीदत के साथ मनाया जा रहा है। इस्लामी कैलेंडर के जिल-हिज्जा महीने की 10 तारीख को मनाया जाने वाला यह पर्व त्याग, प्रेम और अल्लाह के प्रति अटूट विश्वास का प्रतीक है।

देशभर में नमाज का सिलसिला सुबह होते ही देश की प्रमुख मस्जिदों और ईदगाहों में नमाजियों का तांता लग गया। कोयंबटूर, जयपुर, दिल्ली, गुवाहाटी, मुरादाबाद, देहरादून और कोलकाता समेत तमाम शहरों में सुबह की खास नमाज अदा की गई। इस दौरान लोगों ने मुल्क में अमन-चैन और खुशहाली के लिए दुआएं मांगीं। बीजेपी नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने भी दिल्ली में नमाज अदा की।

क्या है ईद-उल-अजहा का इतिहास? इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार, यह त्योहार हजरत इब्राहिम और उनके बेटे हजरत इस्माइल के कड़े इम्तिहान की याद दिलाता है। कहा जाता है कि अल्लाह ने सपने में हजरत इब्राहिम से उनकी प्रिय चीज की कुर्बानी मांगी थी। जब उन्होंने अपने बेटे की कुर्बानी देने का फैसला किया, तो अल्लाह ने उनकी निष्ठा से प्रसन्न होकर फरिश्ते के जरिए इस्माइल की जगह एक भेड़ की कुर्बानी करवा दी। इसी परंपरा की याद में आज भी मुसलमान अल्लाह की राह में कुर्बानी देते हैं।

हज और कुर्बानी का संबंध ईद-उल-अजहा का सीधा संबंध हज यात्रा के समापन से है। मक्का में हज की तमाम रस्में पूरी होने के बाद दुनियाभर के मुसलमान अपनी इबादत को मुकम्मल करते हैं। यह दिन अल्लाह के प्रति समर्पण का सर्वोच्च उदाहरण माना जाता है।

कैसे मनाई जाती है बकरीद? त्योहार के दिन सुबह मुसलमान नए और साफ कपड़े पहनकर ईदगाह पहुंचते हैं। नमाज के बाद अमन के लिए दुआएं मांगी जाती हैं और इसके बाद जानवरों की कुर्बानी की रस्म पूरी होती है।

इस कुर्बानी के गोश्त को तीन हिस्सों में बांटा जाता है:

यह त्योहार न केवल अल्लाह की इबादत का मौका है, बल्कि समाज के जरूरतमंद लोगों की मदद करने और आपसी भाईचारे को मजबूत करने का भी एक जरिया है।

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