मरी हुई बेटी से तलाकशुदा बेटी बेहतर : सुप्रीम कोर्ट में एसजी तुषार मेहता की भावुक टिप्पणी ने झकझोरा समाज
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भोपाल के हाई-प्रोफाइल ट्विशा शर्मा मौत मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में एक बेहद भावुक और कड़वी सच्चाई बयां की गई। भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने समाज की उस मानसिकता पर करारा प्रहार किया, जो रिश्ते निभाने के नाम पर बेटियों की जान जोखिम में डाल देती है।

अदालत में क्या बोले तुषार मेहता? सुनवाई के दौरान एसजी तुषार मेहता ने तल्ख लहजे में कहा, तलाकशुदा बेटी मरी हुई बेटी से कहीं ज्यादा अच्छी होती है। यह टिप्पणी उन्होंने उस दंश को देखते हुए की, जहां परिवार सामाजिक दबाव में अपनी बेटी की चीखों को अनसुना कर देते हैं। तुषार मेहता ने ट्विशा शर्मा के परिवार को भी आड़े हाथों लेते हुए कहा कि अगर समय रहते परिवार ने उसकी शिकायतों को गंभीरता से लिया होता, तो आज वह जीवित होती।

क्या है पूरा मामला? ट्विशा शर्मा अपनी मौत से पहले लगातार अपने परिवार को संदेश भेजकर ससुराल में हो रही प्रताड़ना की जानकारी दे रही थी। लेकिन परिवार ने उसे एडजस्ट करने की सलाह देकर नजरअंदाज कर दिया। आखिरकार 12 मई को ट्विशा अपने ससुराल में मृत पाई गई। अब परिवार का पछतावा है कि उन्होंने उसकी बात क्यों नहीं सुनी।

किरण बेदी ने किया समर्थन पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी ने भी तुषार मेहता के इस बयान का पुरजोर समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि आरोपी परिवार का व्यवहार बेहद गैर-जिम्मेदाराना रहा है। उन्होंने समाज के माता-पिता को एक कड़ा संदेश देते हुए कहा कि पीड़ित परिवार के जख्मों पर नमक छिड़कने के बजाय, हकीकत को समझना जरूरी है। एक तलाकशुदा बेटी का जीवित होना, किसी भी समाज के लिए एक मृत बेटी से बेहतर है।

कौन हैं तुषार मेहता? तुषार मेहता देश के जाने-माने कानूनी विशेषज्ञ हैं और वर्तमान में सॉलिसिटर जनरल के पद पर कार्यरत हैं। 11 सितंबर 1964 को जामनगर में जन्मे तुषार की शिक्षा गुजरात यूनिवर्सिटी से हुई, जहाँ उन्होंने 5 गोल्ड मेडल हासिल किए।

1987 में वकालत की शुरुआत करने के बाद, उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2008 में वे गुजरात के एडिशनल एडवोकेट जनरल बने और 2014 में उन्हें भारत का एडिशनल सॉलिसिटर जनरल नियुक्त किया गया। 2018 से वे देश के सॉलिसिटर जनरल के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

यह मामला केवल एक कानूनी सुनवाई नहीं, बल्कि समाज के लिए एक आईना है, जो याद दिलाता है कि बेटियों की सुरक्षा और उनकी खुशी, सामाजिक प्रतिष्ठा से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

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