असम में बदलेगा शादी-तलाक का कानून: यूनिफॉर्म सिविल कोड पर सरकार की बड़ी तैयारी
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असम विधानसभा में यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) का ड्राफ्ट बिल पेश कर दिया गया है। उत्तराखंड और गुजरात के बाद अब असम इस कानून को लागू करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद, अब 27 मई को विधानसभा में इस पर विस्तृत चर्चा और इसे पारित कराने की योजना है।

क्या बदल जाएगा आम आदमी का जीवन? UCC लागू होने का सबसे बड़ा असर यह होगा कि राज्य में सभी धर्मों के लिए शादी, तलाक, गुजारा भत्ता (अलimony) और विरासत से जुड़े कानून एक समान हो जाएंगे। फिलहाल हर धर्म के अपने निजी कानून हैं, लेकिन UCC आने के बाद एक ही नागरिक संहिता सभी पर लागू होगी।

बहुविवाह पर पूर्ण प्रतिबंध इस नए कानून के तहत बहुविवाह (एक से अधिक विवाह) पर पूरी तरह रोक लगा दी जाएगी। ऐसा करने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इसके साथ ही, शादी और तलाक का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य कर दिया जाएगा।

लिव-इन रिलेशनशिप का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन बिल के अनुसार, अब लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों को स्थानीय प्रशासन के पास अपने रिश्ते का रजिस्ट्रेशन करवाना अनिवार्य होगा। इसे लेकर पहले ही कई हलकों में निजता के अधिकार को लेकर बहस शुरू हो गई है।

बेटियों को मिलेगा संपत्ति में बराबर का हक UCC का एक बड़ा सकारात्मक पहलू महिलाओं के अधिकारों का सुदृढ़ीकरण है। इस कानून के लागू होने के बाद, परिवार की संपत्ति और पिता की विरासत में बेटियों को बेटों के बराबर कानूनी अधिकार मिलेगा।

आदिवासी समुदायों को मिली बड़ी राहत सरकार ने स्पष्ट किया है कि जनजातीय रीति-रिवाजों, परंपराओं और संविधान की छठी अनुसूची (Sixth Schedule) के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों को इस कानून से बाहर रखा जाएगा। इससे आदिवासी समुदायों की विशिष्ट संस्कृति और परंपराएं सुरक्षित रहेंगी।

विपक्ष का विरोध और सियासी घमासान जहाँ सरकार इसे समान कानून और महिला सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, वहीं विपक्ष ने इसे बीजेपी का राजनीतिक एजेंडा करार दिया है। असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने इस पर सवाल उठाए हैं और पर्याप्त चर्चा न करने का आरोप लगाया है।

देश में UCC की वर्तमान स्थिति फिलहाल भारत में गोवा में UCC लागू है और उत्तराखंड में इसकी प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। अब असम और गुजरात जैसे राज्य इसे लागू करने की तैयारी कर रहे हैं। गौरतलब है कि इसके समर्थकों का मानना है कि इससे धर्म आधारित भेदभाव कम होगा, वहीं आलोचकों को धार्मिक स्वतंत्रता और निजता के हनन का डर सता रहा है।

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