जर्मनी की सुस्ती बनाम भारत की रफ्तार: पासपोर्ट रिन्यूअल के अनुभव ने छेड़ दी नई बहस
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जर्मनी में रह रहे एक भारतीय पूर्व खगोल भौतिक विज्ञानी (Astrophysicist) का सोशल मीडिया पोस्ट इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। मयूख पांजा ने बर्लिन और भारत की आधिकारिक प्रक्रिया की तुलना करते हुए भारतीय लॉजिस्टिक्स की जमकर तारीफ की है।

क्या था पूरा मामला? मयूख ने हाल ही में अपना भारतीय पासपोर्ट और जर्मन निवास परमिट (Residence Permit) रिन्यू करवाया। उन्हें उम्मीद थी कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शामिल कई एजेंसियों के कारण भारतीय पासपोर्ट की प्रक्रिया जटिल और धीमी होगी, लेकिन परिणाम उनकी सोच से बिल्कुल उलट रहा।

किताबों से बाहर आकर काम करता है भारतीय सिस्टम मयूख के अनुसार, पूरा पासपोर्ट रिन्यूअल प्रोसेस महज 6 सप्ताह में पूरा हो गया। इसमें कोलकाता पुलिस द्वारा पते का भौतिक सत्यापन और भारत में पासपोर्ट की छपाई के बाद उसे बर्लिन भेजना शामिल था।

वे बताते हैं कि यह किसी चमत्कार से कम नहीं है कि एक अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया इतनी कुशलता से पूरी हो गई। उन्होंने भारतीय तंत्र की विशालता और सामंजस्य की सराहना की।

जर्मनी में क्यों लगा ज्यादा समय? इसके विपरीत, बर्लिन में विदेशी कार्यालय (Ausländerbehorde) के साथ उनका अनुभव काफी धीमा रहा। उन्हें केवल अपॉइंटमेंट लेने में ही 6 सप्ताह लग गए और नए कार्ड की छपाई में 8 सप्ताह का लंबा समय लग रहा है, जबकि यह काम शहर के भीतर ही होना है।

सतर्क आशावाद पर क्या बोले मयूख? इस अनुभव के बाद मयूख ने भारत को लेकर अपने नजरिए पर भी बात की। उन्होंने कहा कि वे भारत को लेकर सतर्क आशावादी हैं।

उनका मानना है कि वे जानते हैं कि देश में अभी भी कई कमियां हैं, लेकिन उन्होंने अपने जीवनकाल में बहुत सारे सकारात्मक बदलाव भी देखे हैं। उन्होंने आश्चर्य जताया कि क्यों कई शहरी भारतीय भारत की प्रगति पर सकारात्मक टिप्पणी करने से कतराते हैं।

निष्कर्ष सेंकड़ों किलोमीटर की दूरी और जटिल अंतरराष्ट्रीय प्रक्रियाओं के बावजूद भारतीय तंत्र ने जिस तरह से इस काम को अंजाम दिया, उसे मयूख ने बेहद प्रभावशाली बताया है। यह पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल है और लोग भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यक्षमता पर गर्व महसूस कर रहे हैं।

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