अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती: क्या RIC की धुरी बदलेगी दुनिया की नई तस्वीर?
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व्लादिमीर पुतिन के प्रमुख वैचारिक सलाहकार एलेक्जेंडर डुगिन ने एक बड़ा दावा किया है। डुगिन का मानना है कि दुनिया अब उस मोड़ पर है जहां पश्चिमी देशों का दशकों पुराना एकाधिकार खत्म हो रहा है। पुतिन के बीजिंग दौरे के दौरान दिए गए उनके इस बयान ने वैश्विक राजनीति के गलियारों में हलचल मचा दी है।

चार ध्रुवों वाली दुनिया की आहट डुगिन के अनुसार, वैश्विक शक्तियों का समीकरण बदल रहा है। अगर भारत, रूस और चीन (RIC) एक साथ मिलकर काम करते हैं, तो दुनिया में चार ध्रुव बन सकते हैं। इसमें रूस और चीन पहले से ही अमेरिकी वर्चस्व को सीधी चुनौती दे रहे हैं, और भारत की बढ़ती स्वतंत्र विदेश नीति इसे एक नया आयाम दे रही है।

पश्चिम के नियमों पर सवाल दूसरे विश्व युद्ध के बाद से ही वैश्विक संस्थाओं, व्यापारिक नियमों और सैन्य गठबंधनों पर अमेरिका और यूरोप का नियंत्रण रहा है। इराक से लेकर अफगानिस्तान तक, पश्चिमी देशों ने लोकतंत्र के नाम पर अपनी नीतियां थोपीं। हालांकि, अब ईरान जैसे देशों का अमेरिका के सामने झुकने से इनकार करना और रूस-यूक्रेन संघर्ष ने यह साबित कर दिया है कि अमेरिकी अजेयता की चमक फीकी पड़ रही है।

चीन की रणनीति और अमेरिका का आत्मसमर्पण ? चीन अब केवल एक आर्थिक ताकत नहीं, बल्कि सैन्य और तकनीकी स्तर पर अमेरिका का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी है। सेमीकंडक्टर हो या एआई, बीजिंग हर क्षेत्र में विस्तार कर रहा है। राजनीतिक विश्लेषक इसे अमेरिका के लिए एक बड़ी चुनौती मानते हैं, जहां वह अब चीन के साथ दो-पक्षीय दुनिया की डील करने की कोशिश में है। जानकारों का कहना है कि यह चीन के सामने अमेरिकी आत्मसमर्पण जैसी स्थिति हो सकती है।

भारत: तीसरा रास्ता या चौथा ध्रुव? भारत की स्थिति सबसे अलग और महत्वपूर्ण है। रूस और चीन की धुरी में शामिल होने के बजाय, भारत रणनीतिक स्वायत्तता पर काम कर रहा है। भारत के रूस के साथ ऐतिहासिक संबंध हैं और पश्चिम के साथ भी रणनीतिक साझेदारी। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत किसी औपचारिक गुट का हिस्सा बनने के बजाय एक स्वतंत्र शक्ति केंद्र के रूप में उभरना चाहता है।

क्या चुनौतियां हैं? भारत के लिए चौथे ध्रुव के रूप में उभरने का रास्ता आसान नहीं है। ऊर्जा सुरक्षा, आत्मनिर्भर उत्पादन क्षमता और चीन की आक्रामकता भारत की सबसे बड़ी चुनौतियां हैं। हालांकि, भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था और तकनीकी क्षमता उसे भविष्य की वैश्विक व्यवस्था में निर्णायक भूमिका निभाने की ओर अग्रसर कर रही है।

निष्कर्ष यह है कि पश्चिम का प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, लेकिन अब दुनिया एक ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ रही है जहां नियम सिर्फ वाशिंगटन या ब्रुसेल्स में नहीं, बल्कि नई दिल्ली, मॉस्को और बीजिंग से भी तय होंगे।

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