बकरीद से पहले बंगाल में कुर्बानी पर घमासान: टीएमसी पहुंची कोर्ट, कानूनी पेंच में फंसी परंपरा
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पश्चिम बंगाल में बकरीद के नजदीक आते ही पशु कुर्बानी का मुद्दा सियासी रंग ले चुका है। एक तरफ सरकार 1950 के कानून का हवाला देकर सख्ती कर रही है, तो दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दे दी है।

महुआ मोइत्रा ने कोर्ट में क्या दलील दी? टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने विधायक अखरुज्जमां के जरिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की। तीन घंटे से अधिक चली सुनवाई के बाद कोर्ट ने आदेश सुरक्षित रख लिया है। मोइत्रा ने तर्क दिया कि 1950 का पशु वध नियंत्रण अधिनियम केवल कृषि और दूध उत्पादन के संरक्षण के लिए था और यह केवल नगरपालिका क्षेत्रों तक सीमित था।

उन्होंने कहा कि इस्लाम में कुर्बानी का अर्थ पैगंबर इब्राहिम की धार्मिक भावना से जुड़ा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस्लाम में बीमार, विकलांग या अयोग्य पशु की कुर्बानी मान्य नहीं है। उनके अनुसार, पशु क्रूरता निवारण अधिनियम भी धार्मिक कुर्बानी को सुरक्षा प्रदान करता है।

नहीं रुकेगी कुर्बानी बनाम कानून का पालन आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के प्रमुख हुमायूं कबीर ने सरकार को सीधी चुनौती दी है। कबीर का कहना है कि 1400 साल पुरानी परंपरा को कोई ताकत नहीं रोक सकती। उन्होंने साफ कहा कि आस्था के मामलों में सरकारी हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

दूसरी ओर, सरकार की मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने स्पष्ट किया कि सरकार कोई नया कानून नहीं ला रही, बल्कि 1950 के मौजूदा कानून को सख्ती से लागू कर रही है। उन्होंने कहा कि 14 साल से कम उम्र के मवेशियों का वध प्रतिबंधित है और बीमार पशुओं के लिए प्रमाण पत्र अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि गाय को माता मानने वाली भावनाओं को देखते हुए नियमों में ढिलाई नहीं बरती जाएगी।

धार्मिक गुरुओं की अपील: संयम ही बेहतर इस विवाद के बीच कोलकाता की नखोदा मस्जिद के इमाम मौलाना मोहम्मद शफीक कासमी ने समुदाय से संयम बरतने की अपील की है। उन्होंने कहा कि दूसरे धर्मों की भावनाओं का सम्मान करते हुए गाय की कुर्बानी से बचना चाहिए। इमाम ने सुझाव दिया कि विकल्प के तौर पर बकरे की कुर्बानी दी जाए।

वहीं, फुरफुरा शरीफ के पीरजादा तोहा सिद्दीकी ने भी कहा कि गोहत्या संबंधी कानून का पालन होना चाहिए। उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि गोहत्या पर रोक लगानी है, तो यह कानून पूरे देश में समान रूप से लागू होना चाहिए, न कि केवल बंगाल में।

वोट बैंक की राजनीति बनाम कानून? सत्ता पक्ष का आरोप है कि पिछली सरकारों ने वोट बैंक के लिए इस पुराने कानून को कभी लागू नहीं होने दिया। अब देखना यह है कि कलकत्ता हाईकोर्ट इस संवेदनशील मुद्दे पर क्या फैसला सुनाता है। फिलहाल, राज्य में बढ़ते तनाव के बीच कानूनी और धार्मिक तर्कों का टकराव जारी है।

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